प्रवेश कुमार मिश्र
नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष द्वारा शुरू की गई आक्रामक मोर्चाबंदी इस वक्त भले ही कुलिंग फेज में दिख रही हो लेकिन कांग्रेसी रणनीतिकार इसे वार्म अप या री ग्रुपिंग फेज मानकर राहुल गांधी की सरप्राइज रणनीति के तहत गांधीवादी तरीके से ऐतिहासिक मोर्चाबंदी करने की तैयारी में हैं. इसके तहत राहुल गांधी एकबार फिर मोर्चेबंदी का नेतृत्व करते हुए रामलीला मैदान में भूख हड़ताल या आमरण अनशन कर इस लड़ाई को बड़ा स्वरूप दे सकते हैं.
सूत्रों की मानें तो इंडिया गठबंधन की ओर से दिल्ली के रामलीला मैदान में आगामी 01 नवंबर को आयोजित होने वाली महारैली से भविष्य की रणनीति स्पष्ट हो जाएगी. क्योंकि रामलीला मैदान जो सरकार के नए निर्देश के बाद घोषित रैली स्थल भी बन गया है उसे कांग्रेस पार्टी की ओर से एक माह के लिए बुक कराया गया है. इससे साफ संकेत है कि रामलीला मैदान से ही आंदोलन को पुनर्जीवित व पुनर्गठित करने की रणनीति बनाई गई है.
सूत्रों की मानें तो जहां एक तरफ कांग्रेस व अन्य सहयोगी दलों की छात्र व युवा इकाइयां धरना प्रदर्शन जैसे पारंपरिक हथियारों के सहारे न सिर्फ केन्द्र सरकार को घेरने का प्रयास करेंगी बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को और तेज करेंगे. वहीं दूसरी ओर लोकसभा में नेताप्रतिपक्ष राहुल गांधी इस लड़ाई को संवैधानिक संस्थाओं की साख से जोड़ते हुए खुद गांधीवादी रणनीति के तहत भूख हड़ताल या आमरण अनशन कर राष्ट्रीय स्तर पर इस आंदोलन को फिर से चर्चा के केन्द्र में ला देंगे. वैसे भी राहुल गांधी ने पिछले दिनों सरप्राइज रणनीति की बात कही थी. सूत्र बता रहे हैं कि राहुल गांधी की रणनीति क्रमवार आगे बढ़ने की रही है.
राहुल ने सबसे पहले सड़क पर आंदोलन, उसके बाद राष्ट्रपति को ज्ञापन और फिर सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे पर दस्तक देकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत मौजूद अधिकार का प्रयोग किया. इसके बाद रैलियों के माध्यम से एकजुटता प्रदर्शित करते हुए गांव-गांव तक संदेश पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा. लेकिन इसी दौरान राष्ट्रीय स्तर पर संदेश देने के लिए राहुल गांधी ने गांधीवादी तरीके से भूख हड़ताल या आमरण अनशन जैसे मारक हथियार को इस्तेमाल में लाने की तैयारी की है. हालांकि अभी तक के किसी आंदोलन में राहुल गांधी भूख हड़ताल या आमरण अनशन जैसे परंपरागत रणनीति के साथ आगे नहीं बढ़े हैं. लेकिन इस बार उनका यह प्रयोग न सिर्फ सत्ता पक्ष पर दबाव बनायेगा बल्कि राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी नेता के रूप में यह बहुस्तरीय संदेश देने की ओर आगे बढ़ जाएगा.
कुलिंग फेज को वार्म अप फेज मान रही है कांग्रेस
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेसी रणनीतिकार भले ही इस शांति को भविष्य में आने वाले बड़े राजनीतिक तूफान से जोड़कर देख रहे हैं लेकिन मौजूदा स्थिति में जो दिख रहा है उसके मुताबिक विपक्षी कुनबे में आई शिथिलता के बाद आंदोलन में दोबारा जान फूंकना राहुल गांधी के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होगा. क्योंकि जब एक बार आंदोलन की तपिश ठंडी पड़ जाती है तो जनता का ध्यान भटक जाता है और ऐसी परिस्थिति में उसे दोबारा उसी स्तर पर संगठित करना आसान नहीं होता. ऐसे में राजनीतिक जानकार भी कह रहे हैं कि विपक्ष के इस कूलिंग फेज का सीधा रणनीतिक लाभ सरकार और भाजपा को मिला है. भाजपाई रणनीतिकारों ने इस समय का उपयोग न केवल खुद को संभालने के लिए किया, बल्कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने स्वयं फ्रंट पर आकर विपक्षी मंशा पर तीखे सवाल दागे हैं.
इतना ही नहीं जहां एक तरफ जंतर-मंतर जैसे प्रदर्शन स्थलों पर प्रशासनिक पाबंदियां और आंदोलनकारी युवा नेताओं को जेल भेजे जाने से जमीनी विरोध की रीढ़ कमजोर हुई है, तो दूसरी तरफ सत्तापक्ष के आक्रामक बयानों ने विपक्ष को पूरी तरह रक्षात्मक होने पर मजबूर कर दिया है. लेकिन इन सबके बीच कांग्रेसी रणनीतिकार इस अल्प विराम को रणनीतिक दूर दृष्टि का हिस्सा मान रहे हैं. उनका तर्क है कि किसी भी आंदोलन को एकरूपता के साथ लंबे समय तक नहीं चलाया जा सकता है इसलिए परिस्थितियों के हिसाब से इसके आक्रामक तेवर को बहुस्तरीय स्वरूप के साथ समायोजित कर बढ़ाया जाना इंडिया गठबंधन की सर्वसम्मत रणनीति है
