रियाद / ढाका, सऊदी अरब में दो बांग्लादेशी नागरिकों—नजरुल इस्लाम और स्वीटी अख्तर—को मक्का स्थित एक मस्जिद के भीतर कथित अनैतिक कृत्य का दोषी पाए जाने के बाद फांसी दे दी गई है। सऊदी गृह मंत्रालय के अनुसार, इस्लामी कानून की ताजीर श्रेणी के तहत न्यायिक समीक्षा के बाद यह कार्रवाई की गई। दोनों नागरिक सऊदी अरब में सफाईकर्मी के रूप में कार्यरत थे। हालांकि, इस घटना के बाद बांग्लादेश सरकार की कांसुलर सहायता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं, क्योंकि ढाका प्रशासन का कहना है कि उन्हें इस फांसी की जानकारी कार्रवाई पूरी होने के बाद मिली।
श्रीलंका ने समय पर सक्रिय कूटनीति और कानूनी सहायता से बचाई अपने नागरिक की जान, सऊदी सुप्रीम कोर्ट ने सजा की रद्द
उसी दौरान श्रीलंका ने अपने नागरिक अनोजान शिवरासा के मामले में त्वरित और प्रभावी राजनयिक हस्तक्षेप का उदाहरण पेश किया। शिवरासा पर सोशल मीडिया पर ईशनिंदा से जुड़ी पोस्ट करने के आरोप में मौत की सजा सुनाई गई थी। श्रीलंका के विदेश मंत्रालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अपने राजदूत को जेल में मुलाकात के लिए भेजा और अपील प्रक्रिया के लिए एक विशेष कानूनी टीम तैयार की। नतीजतन, सऊदी अरब के सुप्रीम कोर्ट ने 13 अक्टूबर को शिवरासा की मौत की सजा को रद्द कर दिया, जिससे कूटनीतिक प्रयासों का महत्व साबित हुआ।
बांग्लादेशी और श्रीलंकाई मामलों की तुलना से कांसुलर संपर्क पर उठी बहस, मानवाधिकार संगठनों ने सरकारों की जिम्मेदारी रेखांकित की
इन दोनों मामलों के विपरीत परिणामों ने विदेशों में काम करने वाले नागरिकों की सुरक्षा और संबंधित देशों के कांसुलर दायित्वों पर एक नई बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार, वियना कन्वेंशन के अनुच्छेद 36 के तहत नागरिकों को हिरासत के दौरान पर्याप्त कानूनी और कांसुलर मदद मिलना बेहद जरूरी है। हालांकि दोनों मामलों की विधिक परिस्थितियां भिन्न थीं, लेकिन श्रीलंकाई कूटनीति की सफलता ने यह साफ कर दिया है कि संकट के समय सरकारों का समय पर उठाया गया कदम किसी नागरिक की जिंदगी बचा सकता है।
