पांच साल में ही दम तोड़ गई सैटेलाइट शिक्षा

सिंगरौली । सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और ग्रामीण अंचलों के बच्चों को आधुनिक तकनीक से पढ़ाने के उद्देश्य से शुरू की गई एडुसैट योजना आज बदहाली की भेंट चढ़ चुकी है।

जिस महत्वाकांक्षी परियोजना का कभी केंद्र सरकार ने जोर-शोर से प्रचार किया था, उसे कुछ ही वर्षों में अव्यवस्था और रखरखाव के अभाव ने निष्प्रभावी बना दिया। करोड़ों रुपये खर्च कर विद्यालयों में लगाए गए उपकरण आज कहीं गायब हैं तो कहीं कबाड़ बन चुके हैं। हालात यह हैं कि जिन बच्चों को उपग्रह के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का सपना दिखाया गया था, उन्हें अब इस योजना के बारे में जानकारी तक नहीं है। वर्ष 2004-05 के दौरान शुरू की गई एडुसैट आधारित दूरस्थ शिक्षा परियोजना के शुरुआती चरण में म.प्र. के सीधी और झाबुआ जिलों को शामिल किया गया था। उस समय सिंगरौली अलग जिला नहीं बना था, इसलिए वर्तमान सिंगरौली क्षेत्र के विद्यालय भी सीधी जिले के अंतर्गत आते थे। परियोजना के तहत सैकड़ों प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों को उपग्रह आधारित शिक्षा नेटवर्क से जोड़ने की पहल की गई थी। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, सीधी क्षेत्र में करीब 800 से अधिक विद्यालयों को इस व्यवस्था से जोड़ने की योजना थी। इधर योजना की सबसे बड़ी विफलता इसके रखरखाव और निगरानी में दिखाई देती है। कई विद्यालयों में उपकरण चोरी होने, सिस्टम गायब होने और तकनीकी उपकरण खराब पड़े रहने की शिकायतें सामने आईं। समय पर मरम्मत नहीं हुई और न ही व्यवस्था को नियमित रूप से संचालित रखने की प्रभावी पहल दिखाई दी। नतीजतन, जिस तकनीक से बच्चों को पढ़ाया जाना था, वह धीरे-धीरे विद्यालयों से गायब होती चली गई।

सैटेलाइट से पढ़ाई के लिए लगाए गए थे उपकरण

योजना का उद्देश्य दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों को ऑडियो-विजुअल माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना था। इसके लिए विद्यालयों में रिसीव ओनली टर्मिनल, एंटीना, ट्रांसीवर और अन्य तकनीकी उपकरण स्थापित किए गए थे। शिक्षकों को भी प्रशिक्षण दिया गया था, ताकि वे नई तकनीक के माध्यम से बच्चों को पढ़ा सके। योजना के क्रियान्वयन में तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह के कार्यकाल का महत्वपूर्ण संदर्भ रहा। उस दौर में इसे ग्रामीण शिक्षा की तस्वीर बदलने वाली पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया था।

विभागीय रिकॉर्ड का अभाव, जवाबदेही किसकी?

हैरानी की बात यह है कि वर्तमान में संबंधित विद्यालयों में योजना के तहत लगाए गए उपकरणों की स्थिति और उनके उपयोग से संबंधित समुचित जानकारी तक उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आ रही है। यदि उपकरण चोरी हुए तो शिकायतें कहां दर्ज हुईं? खराब सिस्टम की मरम्मत क्यों नहीं कराई गई? और करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद योजना का मूल्यांकन किस स्तर पर हुआ? ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब संबंधित विभाग को देना चाहिए। कुल मिलाकर एडुसैट योजना का हश्र सरकारी योजनाओं के रखरखाव और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

इनका कहना:-

यह योजना पुरानी थी, जिन विद्यालयों में एडुसैट योजना संचालित थी, वहां क्यों बंद हो गई, इसकी जानकारी हासिल कर अवगत कराया जाएगा।

आरएल शुक्ला

डीपीसी, जिला शिक्षा केन्द्र, सिंगरौली।

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