बागली: जटाशंकर मार्ग पर काली सिंध नदी के किनारे लगभग 120 वर्ष पुराना लकड़ी माता देवी स्थान आज भी चमत्कारिक रूप से पूजा जाता है। नवरात्रि पर्व पर यहां पर श्रद्धालु भक्ति भाव से पूजा करते हैं। माता जी की स्थापना के विषय में स्थापना करने वाले पचोरिया परिवार के पूर्व पार्षद जितेंद्र पाचौरिया एवं इंदर पाचौरिया ने बताया कि उनकी चौथी पीढ़ी और उनके पर दादा द्वारा जटाशंकर के जंगल में विराजित माता जी को सीर पर रखकर इस स्थान पर लाया गया था। इसके पूर्व वहां स्वयं उस स्थान पर पूजा करने जाया करते थे ।
एक दिन स्वप्न में माता रानी ने कहा कि तू इतनी दूर जाकर कष्ट करता है ।मुझे वही ले चल जहां पर पूजा कर सके भक्त ने यह बात बागली राज परिवार को भी बताई जब माता जी को लेने जाने की बारी आई तो राज परिवार सदस्य एवं गांव के पटेल एवं अन्य वरिष्ठ लोग उनके साथ माता जी को लेने गए परिवार वाले बताते हैं कि लगभग 70 से अधिक पिंडी रूप में माता जी को एक ही टोकने में लेकर आए जिनका वजन लगभग दो से ढाई कुंटल रहा होगा काली सिंध नदी के किनारे इमली के पेड़ के नीचे सभी की सहमति से माता जी की सभी विभक्त पींडिया स्थापित कर दी गई पचोरिया परिवार के सदस्य बताते हैं, कि उस वक्त वर्ष में एक बार नवरात्रि पर्व के दौरान नगर को खुशहाल और निरोगी रखने के लिए बलि प्रथा प्रचलित थी।
जो कालांतर में धीरे-धीरे परिवर्तित हो गई आज भी भुरे कद्दू की बलि दी जाती है। मान्यता अनुसार माताजी सभी के दुख दर्द दूर करती रही हमारे संवाददाता सुनील योगी को श्रद्धालु जितेंद्र पचोरिया ने बताया कि लोग लकड़ी के सहारे यहां पर आते हे और माता जी उनका दर्द दूर कर देती तो लकड़ी यही छोड़कर चले जाते ऐसा कई बार हुआ इसके चलते इस स्थान का नाम ही लकड़ी माता पड़ गया। वर्तमान में इस स्थान पर टीन शेड लगा दिया गया है ,और नवरात्रि पर्व पर श्रद्धालु पूजा करने आते हैं। परिजनों ने आगे बताया कि लंबे समय तक उनके परिवार की वरिष्ठ महिला को माता जी की सवारी आती रही और वह लोगों का दुख दर्द दूर करती रही नवरात्रि पर्व पर उनके मोहल्ले में श्रद्धालुओं की भीड़ बनी रहती थी। आज भी यह स्थान चमत्कार से कम नहीं है दर्द से कराहने वाला व्यक्ति सच्ची श्रद्धा के साथ यहां नमन करता है ।तो उसकी टेक लेने वाली लकड़ी छूट जाती है।
