नई दिल्ली, भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवा शुरू करने की प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और कारोबारी गलियारों में सरगर्मी तेज हो गई है। अमेरिकी उद्योगपति और स्पेसएक्स के सीईओ एलन मस्क तथा लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस विषय को लेकर हुई बातचीत के बाद यह मुद्दा चर्चा के केंद्र में आ गया है। राहुल गांधी की टिप्पणी—जिसमें उन्होंने स्टारलिंक को वैश्विक स्तर पर कई देशों में लाइसेंस मिलने और भारत में अनुमति मिलने में हो रही देरी का जिक्र किया था—के जवाब में एलन मस्क ने इसे ‘चिंताजनक’ करार दिया है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच केंद्र सरकार ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि देश में दूरसंचार और सैटेलाइट संचार सेवाओं के लिए नियम सभी कंपनियों पर समान रूप से लागू होते हैं।
सरकार ने दोहराया पारदर्शी और गैर-भेदभावपूर्ण रवैया, स्पेक्ट्रम आवंटन और सुरक्षा मंजूरियों को बताया अनिवार्य प्रक्रिया
विपक्ष के सवालों और कंपनियों की चिंताओं पर प्रतिक्रिया देते हुए दूरसंचार मंत्रालय ने कहा है कि भारत में सैटेलाइट कम्युनिकेशंस सहित सभी दूरसंचार सेवाओं के लिए पूरी तरह निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण नियामकीय व्यवस्था लागू है। सरकार का यह भी कहना है कि लाइसेंस की शर्तों के तहत प्रत्येक सेवा प्रदाता कंपनी को राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं का कड़ाई से पालन करना होता है। संचार राज्यमंत्री चंद्रशेखर पेम्मासानी ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि सैटेलाइट संचार सेवाओं से जुड़े सुरक्षा पहलुओं पर गृह मंत्रालय और संबंधित एजेंसियां गहराई से विचार कर रही हैं। आवश्यक सुरक्षा मंजूरियां और स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही कंपनियों को व्यावसायिक तौर पर अपनी सेवाएं शुरू करने की पूर्ण अनुमति दी जाएगी।
भारती एयरटेल की यूटेलसैट वनवेब भी कतार में, देश की सुरक्षा और संप्रभुता को दी जा रही है सर्वोच्च प्राथमिकता
बाजार में सिर्फ स्टारलिंक ही नहीं, बल्कि जियो सैटकॉम और भारती समर्थित यूटेलसैट वनवेब जैसी कंपनियां भी सैटेलाइट इंटरनेट के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए जरूरी मंजूरियों का इंतजार कर रही हैं। भारती एयरटेल के चेयरमैन सुनील भारती मित्तल ने भी हाल ही में यह संकेत दिया था कि नियामकीय और सुरक्षा औपचारिकताएं इस सेक्टर की सभी कंपनियों के लिए समान रूप से अनिवार्य हैं। भारत जैसे देश में, जहां सीमाओं और आंतरिक सुरक्षा को लेकर संवेदनशीलता अधिक है, किसी भी नई तकनीक को अपनाने से पहले उसकी तकनीकी विश्वसनीयता और सुरक्षा मानकों की जांच करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है।

