
झाबुआ. मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य झाबुआ जिले में जल जीवन मिशन के अंतर्गत लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के माध्यम से 713 गांवों में करीब 430 करोड़ रुपये के कार्य किए जा रहे हैं। विभागीय सूत्रों के अनुसार, इनमें से 519 गांवों में काम पूरा कर ग्राम पंचायतों को सौंप दिया गया है।
विभाग का दावा है कि लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा जिले के 1,79,785 लोगों के घरों तक नल के माध्यम से शुद्ध, सुरक्षित एवं नियमित जल उपलब्ध कराया जा रहा है। हालांकि, धरातल पर स्थिति विभाग के दावों से अलग नजर आती है। जिले के कई क्षेत्रों में योजनाओं का काम अधूरा पड़ा है और ग्रामीण पानी के लिए परेशान हैं।
ग्राम खेड़ा, धांधलपुरा और पारा क्षेत्र के बख्तपुरा जैसे कई गांवों में नलों से पानी नहीं आ रहा है और नल सूखे पड़े हैं। वहीं, ग्राम नागनखेड़ी और फुटिया जैसे गांवों में नल-जल योजना की पाइपलाइन अब तक नहीं जोड़ी गई है। इसके चलते महिलाओं को अनास नदी में झिरी खोदकर पानी लाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। ग्रामीणों के अनुसार, नदी भी अब सूख चुकी है।
वहीं, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अधिकारियों का कहना है कि योजनाएं पूरी हो चुकी हैं और उनका संचालन ग्राम पंचायतों को सौंप दिया गया है। लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि कई स्थानों पर योजना कागजों में पूरी बताई जा रही है, जबकि जमीनी स्तर पर लोगों को इसका लाभ नहीं मिल रहा है।
इन योजनाओं को लेकर ग्रामीणों ने कई बार जनसुनवाई में कलेक्टर के समक्ष शिकायतें की हैं। मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर भी शिकायतें दर्ज कराई गईं, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग द्वारा समय-समय पर भूजल स्तर गिरने और गर्मी के कारण जल संकट का हवाला देकर शिकायतों का निराकरण कर दिया जाता है।
कलेक्टर द्वारा भी मामले में संबंधित विभागों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। जल संकट को लेकर कई बार ग्रामीणों और आम लोगों ने झाबुआ जिला मुख्यालय पर लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के सामने प्रदर्शन भी किया है। इसके बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं होने से विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।
विभाग के कार्यपालन यंत्री जितेंद्र सिंह मावी से जब भी मामले को लेकर संपर्क करने का प्रयास किया जाता है, तो वे किसी न किसी कार्य में व्यस्तता का हवाला देते हुए अपना पक्ष देने से बचते हैं।
नागनखेड़ी में बनी पानी की टंकी, लेकिन नहीं पहुंचा पानी
नागनखेड़ी में नल-जल योजना के तहत पानी की टंकी बनकर तैयार है, लेकिन यह पूरी तरह सूखी पड़ी है। ग्रामीणों का कहना है कि पिछले तीन वर्षों से उन्हें नल के माध्यम से पानी नहीं मिला है।
गांव में तीन हैंडपंप हैं, लेकिन गर्मी के मौसम में वे भी सूख जाते हैं। ऐसे में महिलाओं और बच्चों को दूर अनास नदी तक जाकर झिरी खोदकर पानी लाना पड़ता है। ग्रामीणों के सामने पेयजल की समस्या लगातार बनी हुई है।
बख्तपुरा में बिजली कनेक्शन नहीं, योजना बंद
इसी तरह पारा क्षेत्र की बख्तपुरा नल-जल योजना को भी विभागीय दस्तावेजों में कवर किया जाना बताया गया है। लेकिन ग्रामीणों के अनुसार, यहां नल से एक बूंद पानी भी नहीं आया है।
ग्रामीणों का कहना है कि योजना के तहत काम तो किया गया, लेकिन बिजली कनेक्शन नहीं होने के कारण योजना शुरू ही नहीं हो सकी। पानी के लिए लोगों को टैंकरों का सहारा लेना पड़ता है, जिसके लिए उन्हें बड़ी राशि चुकानी पड़ रही है।
फुटिया के ग्रामीणों ने कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन
पिछले दिनों झाबुआ जिले के फुटिया गांव के ग्रामीण आदिवासी कांग्रेस के आदिवासी जिलाध्यक्ष आयुष ओहारी और रतन सिंह डामोर के साथ कलेक्टोरेट कार्यालय पहुंचे। ग्रामीणों ने गांव में मूलभूत विकास कार्यों के नाम पर लाखों रुपये के भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा।
ग्रामीणों ने बताया कि गांव में पानी की भारी किल्लत है। नल-जल योजना की पाइपलाइन अब तक नहीं जोड़ी गई है और न ही नया हैंडपंप लगाया गया है। इसके चलते ग्रामीणों को पानी के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है।
430 करोड़ की योजनाओं के बावजूद बूंद-बूंद पानी को तरस रहे ग्रामीण
मध्य प्रदेश के इस आदिवासी जिले में करीब 430 करोड़ रुपये की नल-जल योजनाओं पर काम होने के बावजूद कई गांवों के आदिवासी आज भी नल से जल मिलने का इंतजार कर रहे हैं। एक ओर विभाग योजनाओं को पूरा कर ग्राम पंचायतों को सौंपने का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
अब सवाल यह है कि प्रदेश सरकार, जिला प्रशासन और संबंधित विभाग आखिर कब जागेंगे? क्या इन योजनाओं की जमीनी हकीकत की जांच कर ग्रामीणों को नियमित पेयजल उपलब्ध कराया जाएगा, या फिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद झाबुआ के आदिवासी पानी की बूंद-बूंद के लिए तरसते रहेंगे।
