हाईकोर्ट को गुमराह करने वाले पर 50 हजार का जुर्माना

जबलपुर। हाईकोर्ट ने निजी व्यावसायिक विवाद को जनहित का रूप देकर न्यायालय की प्रक्रिया का इस्तेमाल करने पर सख्ती दिखाई है। न्यायमूर्ति विवेक रूसिया व न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने सहकार ग्लोबल लिमिटेड के खिलाफ दायर याचिका निरस्त करते हुए याचिकाकर्ता पर 50 हजार रुपये की कास्ट लगाई।

दरअसल, सीधी निवासी मनीष सिंह ने आरोप लगाया था कि शहडोल और सिंगरौली में रेत खनन का ठेका संचालित करने वाली कंपनी ने उनके ट्रक के नाम पर 17 फर्जी ई-ट्रांजिट पास जारी किए। सुनवाई के दौरान प्रतिवादी कंपनी के अधिवक्ता शोएब हसन खान पर भी सुनवाई टलवाने और रेत हटाने का अवसर देने जैसे आरोप लगाए गए। हाईकोर्ट ने जांच कराई, जिसमें आरोप सही नहीं पाए गए। कोर्ट ने अधिवक्ता के खिलाफ पूर्व प्रतिकूल टिप्पणियां वापस लेते हुए जांच समाप्त कर दी। कोर्ट ने पाया कि विवाद मूलतः याचिकाकर्ता और कंपनी के बीच परिवहन कार्य से जुड़ा निजी विवाद था। कंपनी ने बताया कि करीब 20 माह में 2,93,797 ईटीपी जारी हुए, जबकि केवल 17 को चुनौती दी गई। कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 226 का मंच निजी विवाद निपटाने के लिए नहीं है और याचिकाकर्ता स्वच्छ हाथों से अदालत नहीं आया। कोर्ट ने 50 हजार रुपये चार सप्ताह में राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा करने का आदेश दिया। कंपनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नमन नागरथ और राज्य की ओर से उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने पैरवी की।

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