रबी फसलों के लिए 17.77 करोड़ टन का विशाल लक्ष्य, 22 अक्टूबर से चलेगा राष्ट्रव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’: शिवराज

नयी दिल्ली 29 सितंबर (वार्ता) केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण शिवराज सिंह चौहान ने मंगलवार को कहा कि अल-नीनो से उपजे हालात का वैज्ञानिक आकलन करते हुए आगामी वर्ष 2026-27 के लिए देश के लिए कुल 37.39 करोड़ टन अनाज उपज का लक्ष्य रखा है, जिसमें अकेले रबी सीजन का लक्ष्य 17.77 करोड़ टन तय किया गया है।

राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन- रबी अभियान 2026 के दौरान एक संवाददाता सम्मेलन में कहा रबी सीजन की यह तैयारी अचानक नहीं हुई है, बल्कि इसके पीछे एक मजबूत और त्रिस्तरीय प्रशासनिक प्रक्रिया रही है। जिला और राज्य स्तर पर भी संवाद किया गया है। पिछले 15 दिनों से राज्य सरकारें निरंतर जिला और राज्य स्तर पर रबी अभियान की तैयारी में जुटी हुई थीं।
केंद्रीय कृषि मंत्री चौहान ने कहा कि वर्ष 2015 के बाद खेती की रफ्तार में ऐतिहासिक उछाल आया है। साल 1967 से 2014 तक जहां कृषि की औसत विकास दर लगभग तीन प्रतिशत के आसपास बनी थी वहीं, 2015 के बाद यह बढ़कर 4.5 प्रतिशत हो गई है यानी औसत विकास दर में 50 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा खरीफ की सफलता के बाद अब पूरे देश में 22 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक ‘खेत बचाओ अभियान’ चलाया जाएगा। उन्होंने बताया कि खेतों तक पूरी मशीनरी पहुंचेगी। इस अभियान के दौरान आईसीएआर के वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्रों के विशेषज्ञ, आत्मा की टीमें, राज्य कृषि विभाग के अधिकारी और केंद्रीय व राज्य मंत्री सीधे गांवों और खेतों में किसानों के बीच जाएंगे। उन्होंने बताया कि अभियान के अंतर्गत मिट्टी की जरूरत के हिसाब से यूरिया और डीएपी का संतुलित उपयोग, उपलब्ध नमी और पानी के आधार पर सही फसल एवं उन्नत किस्म का चयन, खेती में पूंजी की कमी न आए, इसके लिए सभी पात्र किसानों के किसान क्रेडिट कार्ड बनवाना और उनका सही उपयोग सुनिश्चित करना ये सभी कार्य किए जाएंगे।

श्री चौहान ने कहा कि उपज के लाभकारी मूल्य और बाजार के उतार-चढ़ाव से किसानों को बचाने के लिए केंद्र सरकार ने नीतिगत फैसला करते हुए दलहन और तिलहन की खरीद में राज्यों की ओर से होने वाली प्रशासनिक देरी को समाप्त करने का निर्णय लिया गया है। अगर बाजार में कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे गिरती हैं, तो केंद्र सरकार की नोडल एजेंसियां नेफेड और एनसीसीएफ राज्यों का इंतजार किए बिना सीधे मंडियों में उतरकर किसानों से खरीद शुरू करेंगी। इसके बाद राज्य एजेंसियां भी इस प्रक्रिया से जुड़ सकेंगी, ताकि किसान औने-पौने दामों पर अपनी फसल बेचने को मजबूर न हों।

श्री चौहान ने कहा कि अप्रैल महीने से ही केंद्र सरकार ने अल-नीनो से निपटने के व्यापक प्रबंध शुरू कर दिए थे। शुरुआती दौर में (24-25 तारीख तक) देश में मानसूनी वर्षा में 14 प्रतिशत की कमी थी लेकिन पिछले तीन-चार दिनों की अच्छी बारिश के बाद यह कमी घटकर अब मात्र 12 प्रतिशत रह गई है। कृषि विज्ञान के मानकों के अनुसार, जब तक बारिश में 19 प्रतिशत से अधिक की कमी न हो, उसे गंभीर सूखा संकट नहीं माना जाता।

श्री चौहान ने बताया कि कम बारिश के कारण खरीफ फसलों के बुवाई क्षेत्र में भारी गिरावट की जो आशंका थी, वह केंद्र, राज्यों, आईसीएआर और किसानों के प्रयासों से टल गई। बुवाई के क्षेत्रफल में मात्र एक प्रतिशत की मामूली कमी आई है जो लगभग सामान्य के बराबर है। रकबे का फसलवार विश्लेषण करते हुए श्री सिंह ने बताया कि बुवाई में धान, मक्का, सोयाबीन और कपास के क्षेत्र में भी थोड़ी गिरावट दर्ज हुई है लेकिन उड़द, बाजरा, ज्वार, तिल, सूरजमुखी और अरहर जैसी दलहनी, तिलहनी और मोटे अनाजों के रकबे में अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

प्राकृतिक मार से प्रभावित क्षेत्र के बारे में उन्होंने बताया कि कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में भारी बारिश, बाढ़ या सूखे के चलते लगभग 6,11,000 हेक्टेयर क्षेत्र में फसल प्रभावित होने की प्रारंभिक सूचना मिली है जिसके नुकसान का विस्तृत वैज्ञानिक आकलन कराया जा रहा है।

श्री चौहान ने किसानों को स्पष्ट भरोसा दिलाया और राज्यों की मांग बताते हुए कहा कि वर्ष 2026-27 के रबी सीजन के लिए सभी राज्यों की ओर से कुल मिलाकर 380 लाख टन उर्वरक (डीएपी, यूरिया, एनपीके आदि) की मांग प्रस्तुत की गई है जिसकी भरपूर उपलब्धता है। देश में इस समय 163 लाख टन से अधिक उर्वरक का विशाल भंडार पहले से मौजूद है। पिछले साल इसी समय रबी की शुरुआत में यह स्टॉक मात्र 122 लाख टन था।

श्री चौहान ने बताया कि खरीफ सीजन के दौरान प्रमुख राज्यों के दो-दो जिलों में मिट्टी परीक्षण के आधार पर रासायनिक खादों के संतुलित उपयोग का पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया। इसके तहत किसानों को बताया गया कि उनकी जमीन और फसल के लिए कितनी खाद पर्याप्त है। इसका शानदार परिणाम यह रहा कि उन जिलों में उर्वरक की कुल खपत में 27 प्रतिशत की कमी आई और देश को 1400 करोड़ रु. से अधिक की सीधी बचत हुई।

श्री चौहान ने बताया कि राज्यों को आरकेवीवाई और कृषोन्नति योजना के तहत साल के अंत के बजाय समय पर राशि दी जा रही है। पहले जारी 4,000 करोड़ के बाद हाल ही में 3,000 करोड़ से अधिक की राशि जारी की गई है। कुल मिलाकर 7,000 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि राज्यों को हस्तांतरित की जा चुकी है, जिससे योजनाओं का क्रियान्वयन निर्बाध रूप से चल रहा है।

श्री चौहान ने बताया कि गन्ने में ‘रेड रॉट’ (लाल सड़न) और कपास में ‘पिंक बॉलवर्म’ कीट की रोकथाम के लिए आईसीएआर के वैज्ञानिक युद्धस्तर पर रोग-प्रतिरोधी नई किस्में विकसित करने का काम कर रहे हैं। भारत गन्ने के उत्पादन में पूरे विश्व में शीर्ष स्थान पर बना हुआ है।

संवाददाता सम्मेलन में दिल्ली-एनसीआर में ठंड के मौसम में होने वाले वायु प्रदूषण और पराली के मुद्दे पर उठे सवाल पर श्री चौहान ने प्रदूषण में पराली की घटती हिस्सेदारी का जिक्र करते हुए आंकड़ों के साथ बताया कि निरंतर संवाद और किसानों की जागरूकता के कारण वर्ष 2019-20 में जहां प्रदूषण में पराली का योगदान करीब सात प्रतिशत था, वह अब घटकर लगभग 2.5 प्रतिशत रह गया है। किसान स्वयं पराली जलाना पसंद नहीं करते। समाज में यह गलत चित्र पेश किया जाता है कि जैसे सारा प्रदूषण पराली के कारण ही हो रहा है।

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