मेट्ज, 28 सितंबर (वार्ता) पोप लियो 14वें ने यूरोपीय नेताओं से अंतरराष्ट्रीय नियम-आधारित व्यवस्था की रक्षा करने का आह्वान करते हुए बहुपक्षवाद को “वर्चस्व की इच्छा के खिलाफ सबसे अच्छा बचाव” बताया है।
यूरोपीय संघ के प्रमुख वास्तुकारों में शामिल रॉबर्ट शुमान के जन्मस्थान मेट्ज से दिए गए अपने संबोधन में पोप ने युद्ध, भूख, बिगड़ते संबंधों और “बढ़ती असभ्यता” वाले माहौल से चिह्नित होती दुनिया को लेकर चिंता जताई। उन्होंने नागरिकों और सरकारों के बीच बढ़ते अविश्वास के लिए “झूठ और छल” को भी जिम्मेदार ठहराया।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की मौजूदगी में फ्रांसिसी भाषा में दिए संबोधन में पोप ने कहा, “यूरोप दूसरों के सम्मान के सिद्धांत को कायम रखकर इस चक्र को तोड़ सकता है। उसने पिछले 80 वर्षों में यह साबित किया है कि अलग-अलग विचारों, मांगों और हितों को टकराव के बजाय संवाद के माध्यम से व्यक्त करना संभव है।”
पोप ने रूस-यूक्रेन युद्ध का सीधे उल्लेख नहीं किया, लेकिन यूरोपीय धरती पर एक नये “निरर्थक नरसंहार” की निंदा की और देशों से बातचीत का रास्ता अपनाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, “धैर्यपूर्वक संवाद करना, बातचीत में साहस दिखाना और शांति के व्यापक हित के लिए कुछ मुद्दों पर अपने रुख से समझौता करने को तैयार रहना आवश्यक है।”
पोप ने यूरोप से अपनी ईसाई विरासत को स्वीकार करने का भी आग्रह किया और कहा कि यूरोप केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक “सांस्कृतिक और ऐतिहासिक वास्तविकता” है। उन्होंने कहा, “हम यूरोप की बात ईसाई धर्म का उल्लेख किए बिना नहीं कर सकते।” उनके अनुसार, यूरोप ने तब प्रगति की जब उसने अपने अतीत के तत्वों से प्रेरणा लेते हुए दूसरों के साथ संवाद के जरिए खुद को बदला।
उन्होंने कहा, “यूरोप तब समृद्ध और प्रगतिशील हुआ जब वह अपने अतीत के सर्वोत्तम पहलुओं को अपनाकर दूसरों के साथ संपर्क के माध्यम से उन्हें नये और रचनात्मक तरीकों से ढाल सका।”
श्री मेट्ज को इस संबोधन के लिए इसलिए चुना गया क्योंकि इसका यूरोपीय मेल-मिलाप और एकीकरण से गहरा संबंध है। जर्मनी की सीमा के निकट उत्तर-पूर्वी लोरेन क्षेत्र में स्थित इस शहर का इतिहास फ्रांस और जर्मनी के बीच संघर्ष से जुड़ा रहा है। मेट्ज कई बार दोनों देशों के बीच आता-जाता रहा और 1940 में नाजी जर्मनी ने इसे अपने कब्जे में ले लिया था।
फ्रांस के राष्ट्रपति कार्यालय एलिसी पैलेस ने कहा कि कार्यक्रम का उद्देश्य लोरेन के “यूरोपीय और सीमा-पार आयाम” को रेखांकित करना था, जो संघर्ष और सहयोग के साझा इतिहास से जुड़ा क्षेत्र है।
यूरोपीय संघ के नेताओं और यूरोपीय संस्थानों के प्रमुखों को कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था। हालांकि, मैक्रों के साथ केवल सीमित संख्या में नेता शामिल हुए, जिनमें मोनाको, अंडोरा और लक्जमबर्ग के प्रतिनिधि शामिल थे। विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे, जिनमें फ्रांस के मुख्य रब्बी हाइम कोर्सिया और पेरिस की ग्रैंड मस्जिद के रेक्टर शेम्स-एद्दीन हफिज शामिल थे।
