
झाबुआ. दाहोद-इंदौर रेल लाइन परियोजना को लेकर 18 साल बाद भी स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है। झाबुआ से धार के बीच रेल लाइन का काम अब तक शुरू नहीं हो सका है। आदिवासी बाहुल्य झाबुआ जिले के लोग वर्षों से रेल सुविधा का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन अभी तक यहां रेल पटरी बिछने का सपना पूरा नहीं हुआ है।
8 फरवरी 2008 को झाबुआ के स्थानीय हरिभाई की बावड़ी के विशाल मैदान में जिले के करीब एक लाख वनवासियों को संबोधित करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी में घोषणा की थी कि झाबुआ में तीन साल के भीतर रेल दौड़ेगी। उस समय कहा गया था कि रेल सुविधा मिलने से आदिवासी जिले की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल जाएंगी। लेकिन वर्ष 2008 से 2026 तक 18 साल बीतने के बाद भी यहां के लोग रेल का इंतजार कर रहे हैं। स्थिति यह है कि रेल आना तो दूर, कई हिस्सों में पटरी तक नहीं बिछ पाई है।
इसी परियोजना के साथ छोटा उदयपुर-वाया अलीराजपुर-धार रेल लाइन परियोजना का भी शिलान्यास किया गया था। छोटा उदयपुर से टांडा और धार जिले तक इस परियोजना का काम पूरा हो चुका है और कुछ हिस्सों में रेल का संचालन भी शुरू हो गया है। वहीं, दाहोद-इंदौर रेल लाइन पर इंदौर से धार तक भी रेल संचालन की तैयारियां चल रही हैं।
इसके बावजूद झाबुआ से धार के बीच रेल लाइन का काम अब तक शुरू नहीं हो पाया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि रेलवे द्वारा बार-बार परियोजना का रूट बदले जाने, भूमि अधिग्रहण में देरी और मुआवजा राशि का वितरण नहीं होने के कारण परियोजना लगातार अटकती रही है।
रेलवे ने फिलहाल दाहोद से झाबुआ तक रेल लाइन का काम किया है, जो अभी भी पूरी तरह तैयार नहीं है। रेलवे के अनुसार करीब 65 करोड़ रुपये की लागत से झाबुआ रेलवे स्टेशन का निर्माण पूरा हो चुका है और रेल लाइन भी बिछाई जा चुकी है। हालांकि, कुछ स्थानों पर अभी काम बाकी है, जिसे आने वाले समय में पूरा किए जाने की बात कही जा रही है।
झाबुआ से धार के बीच रेल लाइन की स्थिति को लेकर जब सवाल किया जाता है तो रेलवे अधिकारियों की ओर से भी स्पष्ट समयसीमा सामने नहीं आ पाती। रेलवे के प्रोजेक्ट इंजीनियर मनुसखभाई चौहान के अनुसार दाहोद से झाबुआ के बीच रेलवे लाइन का करीब 10 प्रतिशत काम शेष है। वर्तमान में यहां पटरी बिछाने का काम किया जा रहा है और अगले एक वर्ष में दाहोद से झाबुआ के बीच रेल सेवा शुरू किए जाने की संभावना है।
वहीं, इंदौर-दाहोद रेल लाइन महासमिति के महामंत्री दिलीप वर्मा का कहना है कि रेलवे और राजस्व अधिकारियों की लापरवाही के चलते झाबुआ से धार के बीच रेल लाइन का काम अटका हुआ है। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधियों को भी इस दिशा में तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। उनका आरोप है की एक बार सर्वे होने के बाद बार-बार रूट बदलने के लिए सर्वे कराया जाना परियोजना को लंबा खींचने जैसा है।
इस रेल परियोजना का श्रेय लेने को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच भी राजनीतिक खींचतान जारी है। कांग्रेस के पूर्व सांसद कांतिलाल भूरिया का कहना है कि रेल परियोजना उनके कार्यकाल में शुरू की गई थी, लेकिन बाद में भाजपा सरकार ने इस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। वहीं, भाजपा नेताओं का कहना है कि उनकी सरकार परियोजना के लिए राशि उपलब्ध कराकर इसे पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह हैं, लेकिन झाबुआ जिले के आदिवासी पिछले 18 वर्षों से रेल सुविधा का इंतजार कर रहे हैं। लंबे समय से चल रही इस परियोजना को लेकर अब भी लोगों में असमंजस बना हुआ है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर दाहोद-इंदौर रेल लाइन परियोजना पूरी तरह कब तक तैयार होगी और झाबुआ से धार के बीच रेल कब दौड़ेगी।
परियोजना के उद्घाटन अवसर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने झाबुआ जिले में रेलवे स्लीपर बनाने का कारखाना स्थापित किए जाने की भी घोषणा की थी। हालांकि, यह घोषणा भी अब तक अमल में नहीं आ सकी है। इस संबंध में आज तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है और रेलवे के पास भी इस प्रकार के किसी प्रस्ताव की जानकारी उपलब्ध नहीं होने की बात कही जा रही है।
