गौशाला में ‘सफाई’ या दावों की पोलपट्टी? स्वास्थ्य अधिकारी संजय सोनी ने दी सफाई—’मरने वाले मवेशी बीमार थे’, पर बेजुबानों की सिसकियों पर अब भी कायम हैं सुलगते सवाल!

कटनी। अमीरगंज गौशाला में भूख, प्यास और बदहाली से तड़प-तड़पकर दम तोड़ते बेजुबानों की तस्वीरें सामने आने के बाद मचे हड़कंप पर अब नगर निगम प्रशासन का ‘बचाव पत्र’ सामने आया है। मामले में घिरे नगर निगम के स्वास्थ्य अधिकारी संजय सोनी ने अपना प्रतिवेदन सौंपते हुए गौशाला की व्यवस्थाओं को ‘ऑल इज वेल’ बताने की कोशिश की है।

लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या केवल “बीमार और रेस्क्यू किए गए मवेशी” कहकर दर्जनों बेजुबानों की कीचड़ में घुट-घुटकर हुई मौत की जवाबदेही से पल्ला झाड़ा जा सकता है?

स्वास्थ्य अधिकारी संजय सोनी की सफाई: ‘रेस्क्यू किए गए बीमार मवेशी थे

नगर निगम के स्वास्थ्य अधिकारी संजय सोनी ने खबर का खंडन करते हुए दावा किया है कि:

* रेस्क्यू किए गए मवेशी: वीडियो में दिख रहे मृत पशु गौशाला में नियमित रहने वाले मवेशी नहीं थे, बल्कि कैचिंग स्क्वाड द्वारा शहर के मार्गों से रेस्क्यू करके लाए गए गंभीर रूप से बीमार और निराश्रित पशु थे।

* इलाज की नाकाम कोशिश: पशु चिकित्सक द्वारा उपचार के सघन प्रयास किए गए, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। इसके बाद प्रक्रिया के तहत उनका निस्तारण (इन्सिनरेशन) किया गया।

* टाइमिन्ग पर तर्क: जिस समय का वीडियो वायरल हुआ, उस वक्त टीम मृत पशुओं को उठाने ही पहुँच रही थी।

* चारा, पानी और कर्मचारी: गौशाला में चारा-पानी पर्याप्त है और व्यवस्था के लिए 3 शिफ्टों में 3 कर्मचारी, 1 सुपरवाइजर तथा हांका गैंग प्रभारी तैनात हैं। बारिश के कारण कीचड़ हुआ था, जिसकी सफाई कराई जाती है।

कागजी दावों पर भारी ‘जमीनी हकीकत’: प्रशासन के तर्कों से उठे 4 तीखे सवाल

निगम प्रशासन भले ही सब कुछ दुरुस्त बता रहा हो, लेकिन वीडियो फुटेज की खौफनाक तस्वीरें स्वास्थ्य अधिकारी के दावों की सीधे पोल खोलती हैं:

* कीचड़ में तड़पते नन्हे बछड़े भी ‘रेस्क्यू’ किए गए थे?:

* यदि मवेशी बीमार थे, तो उन्हें दलदल और बदबूदार कीचड़ के बीच क्यों पटक दिया गया? क्या एक बीमार जानवर को सूखे, साफ और सुरक्षित स्थान पर रखकर इलाज देने की बुनियादी व्यवस्था भी नगर निगम के पास नहीं थी?

* रेस्क्यू के नाम पर मौत के कुएँ में धकेलना कैसा न्याय?:

* यदि सड़क से ‘रेस्क्यू’ करके लाए गए जानवर गौशाला में आकर ही दम तोड़ रहे हैं, तो यह कैसा ‘रेस्क्यू’ है? सड़कों से उठाकर मवेशियों को इस नारकीय यातनागृह में सिर्फ मरने के लिए लाया जाता है?

तीन शिफ्टों में तैनात अमला कहाँ था?:

निगम का दावा है कि 4 कर्मचारी और सुपरवाइजर तैनात हैं। तो फिर बेजुबानों के घावों पर मक्खियाँ और कौवे क्यों मंडरा रहे थे? क्या नदारद कर्मचारियों पर कोई सख्त दंडात्मक कार्रवाई हुई, या सिर्फ प्रतिवेदन बनाकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश हो रही है?

अस्पताल या बूचड़खाना?:

* इलाज के दावों के बीच मवेशियों के शरीर पर गहरे जख्म और उनकी आँखों से बहता खून यह साफ बयां करता है कि इलाज के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की जा रही थी।

जनता में आक्रोश: “अधिकारियों पर दर्ज हो एफआईआर”

स्वास्थ्य अधिकारी की इस सफाई से स्थानीय लोग और गौरक्षक बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हैं। जनता का कहना है कि हर बार लापरवाही उजागर होने पर अधिकारी अपनी कुर्सी बचाने के लिए कागजी रिपोर्ट तैयार कर लेते हैं।

यदि सच में तीन शिफ्टों में सफाई हो रही थी और पर्याप्त चारे-पानी का बजट है, तो मौके पर पहुँचे किसी भी व्यक्ति का दिल दहल जाने जैसी स्थिति क्यों बनी?

आक्रोशित नगरवासियों ने माँग की है कि केवल प्रतिवेदन सौंपने से काम नहीं चलेगा। पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और गौशाला प्रभारी संजय सोनी समेत ड्यूटी से नदारद रहने वाले कर्मचारियों व जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि बेजुबान ‘गौमाता’ को इस नारकीय यातना से मुक्ति मिल सके।

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