
ओंकारेश्वर। आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास द्वारा आयोजित 95वीं शंकर व्याख्यानमाला में ‘वेद प्रामाण्यम विचार’ विषय पर मंथन हुआ। एकात्म धाम के यूट्यूब चैनल पर प्रसारित व्याख्यान में स्वामिनी तत्त्वप्रियानन्द सरस्वती ने वेदों के प्रामाण्य, आत्मविद्या और वेदांत की प्रासंगिकता पर विचार रखे।
स्वामिनी जी ने कहा कि ‘वेद’ शब्द ‘विद्’ धातु से बना है जिसका अर्थ ज्ञान है। वेदों में निहित ज्ञान को ‘आर्ष विद्या’ कहा गया है, क्योंकि ऋषियों ने शाश्वत सत्यों का साक्षात्कार कर उन्हें मानव कल्याण के लिए परंपरा में संरक्षित किया। जैसे वैज्ञानिक प्रकृति के नियमों की खोज करते हैं, वैसे ही ऋषियों ने अस्तित्व और जीवन के मूल सत्यों को जाना।
उन्होंने वेद के दो पक्षों – कर्मकांड और ज्ञानकांड (वेदांत) की विवेचना की। कर्मकांड में इच्छा पूर्ति के लिए कर्म का विधान है, जबकि वेदांत इच्छा करने वाले ‘स्वयं’ के स्वरूप की पड़ताल कर आत्मज्ञान से पूर्णता का बोध कराता है।
आत्मविद्या किसी बाहरी वस्तु की प्राप्ति नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने का ज्ञान है। भारतीय दर्शन के छह प्रमाणों – प्रत्यक्ष, अनुमान, अर्थापत्ति, उपमान, अनुपलब्धि और शब्द प्रमाण पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इंद्रियों से परे आत्मतत्व को जानने में शब्द प्रमाण और गुरु-शिष्य परंपरा का विशेष स्थान है।
उल्लेखनीय है कि स्वामिनी तत्त्वप्रियानन्द सरस्वती वडोदरा में वेदांत प्रचार में सक्रिय हैं और 2010-13 तक स्वामी दयानंद सरस्वती के कोयंबटूर आश्रम में अध्ययन किया है। न्यास द्वारा पिछले 7 वर्षों से व्याख्यानमाला आयोजित की जा रही है और ओंकारेश्वर में 108 फीट ऊंची शंकराचार्य की ‘एकात्मता की प्रतिमा’ सहित एकात्म धाम विकसित किया जा रहा है।
