निवेशकों और कंपनियों को बड़ी राहत, सेबी ने पीएमएस (PMS) के नए नियमों को दी मंजूरी

नई दिल्ली,  भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) क्षेत्र के लिए एक नई और आधुनिक नियामकीय व्यवस्था को औपचारिक मंजूरी दे दी है। नियामक द्वारा जारी ‘सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (पोर्टफोलियो मैनेजर्स) रेगुलेशंस, 2026’ साल 2020 के पुराने नियमों का स्थान लेंगे। इस नए ढांचे का मुख्य उद्देश्य पीएमएस उद्योग के विकास को बढ़ावा देना, अनुपालन प्रक्रियाओं को अधिक सरल बनाना और बाजार में अनावश्यक नियमों को हटाकर पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। इसके तहत अब पोर्टफोलियो मैनेजर्स को ग्राहकों के धन को आईपीओ (IPOs) और प्राथमिक ऋण निर्गमों (Debt Segments) जैसे क्षेत्रों में निवेश करने की अधिक लचीली छूट मिल गई है।

डीपीएमएस के लिए अतिरिक्त निवेश और डेरिवेटिव्स के उपयोग में लचीलेपन का प्रावधान, सुरक्षा के कड़े उपाय भी शामिल

सेबी के इन नए संशोधनों के तहत विवेकाधीन पोर्टफोलियो प्रबंधन सेवाओं (DPMS) को भी कुछ खास शर्तों के साथ अतिरिक्त निवेश के अवसर दिए गए हैं। ग्राहक की स्पष्ट सहमति से कुल प्रबंधित संपत्ति (AUM) का 10 प्रतिशत तक हिस्सा गैर-परिवर्तनीय और गैर-सूचीबद्ध ऋण प्रतिभूतियों में लगाया जा सकेगा। साथ ही, एक्सचेंज-ट्रेडेड डेरिवेटिव्स के उपयोग में भी लचीलापन बढ़ाते हुए एक्सपोजर की सीमा को कुल एयूएम के 1.25 गुना तक तय किया गया है। इसके अलावा, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के लिए कमोडिटी डेरिवेटिव्स बाजार में भागीदारी का दायरा बढ़ाया गया है, हालांकि सट्टेबाजी रोकने के लिए टेंडर पीरियड से पहले पोजीशन बंद करने जैसे सुरक्षात्मक नियम भी अनिवार्य किए गए हैं।

कमोडिटी डेरिवेटिव्स बाजार में तरलता बढ़ाने का प्रयास, निवेशकों को मिलेगा विविधीकरण का बेहतर अवसर

नियामक के इन बदलावों से भारतीय पूंजी बाजार में तरलता (Liquidity) और बाजार की गहराई में और अधिक सुधार होने की उम्मीद है। एफपीआई अब गैर-कृषि सूचकांक आधारित डेरिवेटिव्स में आसानी से भाग ले सकेंगे। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि इन सुधारों से न केवल पोर्टफोलियो प्रबंधकों के पास निवेश के नए रास्ते खुलेंगे, बल्कि निवेशकों को भी अपने पोर्टफोलियो को विविधतापूर्ण (Diversify) बनाने के बेहतर और सुरक्षित अवसर प्राप्त होंगे। सेबी का यह कदम देश के वित्तीय बाजारों को वैश्विक मानकों के अनुरूप मजबूत और प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में एक अहम मील का पत्थर साबित होगा।

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