सड़क पर चुनौती में बदलने लगे तोमर-सिंधिया खेमों के मतभेद

ग्वालियर चंबल डायरी 

 

   हरीश दुबे 

 

ग्वालियर भाजपा में नरेन्द्र सिंह तोमर और सिंधिया खेमों की सियासी अदावत अब कार्यक्रमों में मारकुटाई और काले झंडों तक पहुंच गई है। एक रोज पहले ग्वालियर दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में सिंधिया की मौजूदगी में आयोजित कुशवाहा समाज के एक कार्यक्रम में जिस तरह कार्यकर्ताओं के बीच मारपिटाई के हालात बने, उसने पार्टी में चल रही गुटबाजी को एक बार फिर से सतह पर ला दिया। ग्वालियर भाजपा के साफ तौर पर दो गुटों में बंटने की आधार-कथा एक दिन में तैयार नहीं हुई, बल्कि मार्च 2020 में सिंधिया के भाजपा में प्रवेश के साथ ही यह विभाजन महसूस किया जाने लगा। उससे पहले तक पार्टी के स्थानीय संगठन पर नरेन्द्र सिंह का एकाधिकारिक वर्चस्व था लेकिन सिंधिया द्वारा अपने हजारों समर्थकों के साथ भगवामय होने के बाद पहले से जमे खेमे को अपना गढ़ बचाने की चिंता हुई तो नवागंतुकों की कोशिश पार्टी पर वर्चस्व स्थापित करने की थी। इसी खेमेबाजी के सुर राजनीति की अंत:वीथिकाओं से बाहर निकलकर पहली बार किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में हिंसक स्वरूप में व्यक्त हुए। हालांकि यह कार्यक्रम विशुद्ध रूप से कु शवाहा समाज का था और इसका राजनीति से लेनादेना नहीं था, चूंकि ग्वालियर में कुशवाहा समाज के दोनों बड़े नेता मंत्री नारायण सिंह और सांसद भारतसिंह क्रमशः सिंधिया और नरेन्द्र सिंह से जुड़े हैं, लिहाजा अप्रत्यक्ष रुप से यहां भी राजनीति ने प्रवेश कर लिया। कार्यक्रम सिंधिया से जुड़े नारायण सिंह का था और इसमें नरेंद्र सिंह के खास माने जाने वाले सांसद भारत सिंह को नहीं न्यौता गया था, लिहाजा नारायण सिंह ने नाम लिए बगैर इशारों ही इशारों में इस उपद्रव का ठीकरा भारत सिंह पर फोड़ दिया। हालांकि ग्वालियर में सिंधिया के कार्यक्रम में इस तरह का उपद्रव अनहोनी सी घटना है लेकिन सिंधिया ने इसे कुशवाहा समाज का अंदरूनी मामला मानकर ज्यादा संजीदगी से नहीं लिया।

   *नेताओं के दखल से इधर गुर्जर समाज भी बंट गया* 

ग्वालियर चंबल की सियासत में गुर्जर समाज खासा असर रखता है। इस समाज से सांसद और विधायक चुने जाते रहे हैं। राजनीतिक दल भले ही इस समाज को चुनाव के समय वोट बैंक मानें लेकिन समाज के धुरंधरों ने दोनों प्रमुख दलों के संगठन पर भी पकड़ बनाई है। समाज की एक्टिविटी बढ़ती है तो उसका नेतृत्व करने वाले संगठन को विखंडन और खेमेबाजी जैसी समस्याओं से भी जूझना पड़ता है। ग्वालियर में कुछ ऐसा ही अभा गुर्जर महासभा के साथ हो रहा है। करीब सवासौ साल पुराना यह संगठन दो खेमों में बंट गया है। दोनों ही खेमे खुद को असली बता रहे हैं। एक खेमे की कमान सिंधिया के विश्वासपात्रों में शुमार किए जाने वाले जीडीए के पूर्व अध्यक्ष जितेन्द्र गुर्जर प्रदेशाध्यक्ष के रूप में संभाल रहे हैं तो दूसरे खेमे की कमान सिंधिया का साथ छोड़ नरेंद्र सिंह के साथ जाने वाले पूर्व विधायक रामवरण सिंह के हाथों में हैं। इस महीने दोनों खेमों ने शक्ति प्रदर्शन कर समाज पर अपना वर्चस्व साबित करने की कोशिश की। जितेन्द्र गुर्जर ने सम्राट मिहिर भोज के जयंती समारोह एवं शपथ ग्रहण के बहाने मेला के जलसा गार्डन में ताकत दिखाई तो इससे पहले रामवरण सिंह ने बाहर से आए तमाम नेताओं को शिवपुरी हाईवे रोड के एक रिसॉर्ट में जोड़कर बड़ी बैठक रखी। रामवरण और जितेन्द्र गुर्जर अपने अपने कारणों से भले ही एक दूसरे के जलसों में नहीं गए लेकिन समाज के बुजुर्ग संगठन के बंटने से चिंता में हैं।

*भगवा के राष्ट्रीय फलक पर फिर छाया चंबल*

ग्वालियर चंबल को एक बार फिर सत्तारूढ़ दल के राष्ट्रीय फलक पर मौका मिला है। भिंड के दो धुरंधर पूर्व विधायकों अरविंद भदौरिया और लालसिंह आर्य को क्रमशः आंध्र का प्रभारी और पश्चिम बंगाल का सहप्रभारी बनाया गया है। यानि चंबल के ये दोनों नेता सुदूर स्थित इन अहिंदीभाषी सीमावर्ती राज्यों में जाकर भगवा परचम फहराएंगे। कुछ ऐसी ही उपलब्धि ग्वालियर शहर के साथ जुड़ी है। यहां के आशीष ऊषा अग्रवाल को 37 दिन के भीतर ही दूसरा प्रमोशन देते हुए पार्टी का राष्ट्रीय मीडिया संयोजक बनाया गया है। इससे पहले 17 अगस्त को उन्हें मीडिया विभाग का राष्ट्रीय सह-संयोजक बनाया गया था। हालांकि ये तीनों नेता अब ग्वालियर से इतर जिम्मेदारी संभालेंगे लेकिन इन्होंने अटेर, गोहद और ग्वालियर पूर्व सीट पर टिकट की दावेदारी छोड़ी नहीं है।

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