मध्य क्षेत्र की डायरी
संदीप चंसौरिया
ड्रोन तीन दिन में वह काम कर गया, जिसे सरकारी तंत्र सालों में नहीं कर पाया. बड़े तालाब की हदें फिर सामने आ गईं और उसके आंचल में घुसे अतिक्रमण भी. अब नगर निगम को एनजीटी के सामने रिपोर्ट रखनी है. असली परीक्षा यहीं से शुरू होती है. रिपोर्ट में अतिक्रमण दर्ज होंगे या उनके खिलाफ कार्रवाई भी दर्ज होगी. क्योंकि, भोपाल के बड़े तालाब की कहानी में सीमांकन कोई नया अध्याय नहीं है. पहले भी हदें खिंचीं, मुनारें लगीं, अतिक्रमण चिन्हित हुए और एनजीटी ने आदेशों की झड़ी लगाई. जुलाई में एनजीटी ने छह साल तक प्रभावी कार्रवाई नहीं होने पर अधिकारियों को फटकार लगाई थी. अगस्त में सामने आया कि सात आदेशों के बावजूद कार्रवाई अधूरी है और 365 अतिक्रमणों का मामला अब भी अटका हुआ है. अब ड्रोन ने फिर तालाब का आईना सामने कर दिया है.
सवाल यह है कि आईना दिखने के बाद चेहरा साफ होगा या आईना ही ढंक दिया जाएगा. एनजीटी ने इस बार केवल कागजी सीमांकन नहीं, बल्कि ड्रोन, सैटेलाइट इमेजरी, जियो-टैगिंग और ग्राउंड ट्रूथिंग जैसे वैज्ञानिक तरीकों से वास्तविक एफटीएल तय करने को कहा है. साथ ही पहले से मौजूद अवैध निर्माणों पर कार्रवाई की समयसीमा भी तय की गई है. लेकिन, भोपाल में मुश्किल तालाब की सीमा खोजने की नहीं, रसूख की सीमा तय करने की है. जिन इलाकों में अतिक्रमण सामने आते हैं, वहां सवाल सिर्फ ईंट-पत्थर का नहीं होता. सवाल यह भी होता है कि निर्माण किसका है, अनुमति किसने दी, इतने साल तक किसकी नजर नहीं पड़ी और कार्रवाई की फाइल किस मेज पर जाकर सो गई. और, यहीं लोकतंत्र का सबसे असहज सवाल खड़ा होता है.
अगर अतिक्रमण करने वाला कभी सत्ता के करीब था या आज सत्ता के करीब है, तो क्या बुलडोजर की रफ्तार बदल जाएगी. रिपोर्ट तैयार करने वाले अधिकारी भी आखिर उसी व्यवस्था का हिस्सा हैं, जिस पर कार्रवाई करनी है. इसलिए, जनता की दिलचस्पी सिर्फ रिपोर्ट में नहीं, उसके अगले पन्ने में है. किस पर कार्रवाई हुई और किस पर नहीं हुई. बड़ा तालाब भोपाल की पहचान है. उसकी खूबसूरती का मतलब सिर्फ पानी का फैला हुआ विस्तार नहीं, बल्कि वह खुला आंचल है जो शहर को सांस देता है. अगर उसकी हदों में आलीशान निर्माण, फार्महाउस और दूसरे कब्जे टिके रहेंगे तो फिर हर साल सीमांकन का ड्रोन उड़ाना भी एक रस्म से ज्यादा क्या होगा. ड्रोन ने अपना काम कर दिया है. अब सरकारी मशीनरी तालाब की हद बचाती है या हद बचाने के नाम पर सिर्फ फाइल की हद तक ही कार्रवाई करती है, यह सीमांकन का सबसे अहम पहलू है, जिसका बड़ा तालाब के साथ-साथ भोजपालवासियों को भी इंतजार है.
बगैर मुखिया जनविश्वास सिर्फ रस्मअदायगी
जनता से सीधे संवाद का नाम ‘जनविश्वास’ रखा गया था. अब लगता है शुक्रवार तो वही है, संवाद भी वही है, बस शासन का हिस्सा कही अदृश्य होता दिख रहा है. दरअसल, मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव पिछले दो सप्ताह से व्यस्तता के चलते अभियान को समय नहीं दे पाए. छिंदवाड़ा से शुरू हुए अभियान का संदेश साफ था. हर शुक्रवार सरकार दफ्तरों की कुर्सियां छोड़कर जनता के बीच होगी. मुख्यमंत्री ने खुद शिकायतें सुनीं और मौके पर अधिकारियों पर कार्रवाई भी की. सवाल यह नहीं कि मुख्यमंत्री हर शुक्रवार जिले में पहुंचें. यह व्यावहारिक भी नहीं. अभियान की पहचान तो तभी है जब मुख्यमंत्री की गैरमौजूदगी में भी जिलों में मंत्री और अधिकारी जनविश्वास को बरकरार रखें, ना कि रस्म निभाएं. अभियान के पहले महीने में सरकार ने 5.64 लाख सीएम हेल्पलाइन शिकायतों के निराकरण का आंकड़ा जारी किया है. लेकिन, जनविश्वास सिर्फ आंकड़ों से नहीं बनता, वरना इसका नाम जन-निराकरण अभियान रख दिया जाता. जनता को यह भरोसा चाहिए कि शुक्रवार कोई सरकारी कैलेंडर की खानापूर्ति नहीं, सचमुच सरकार के जनता के दरवाजे तक पहुंचने का दिन है. वरना डर यही है कि कहीं जनविश्वास धीरे-धीरे जन-विश्राम अभियान न बन जाए.
