नई दिल्ली, देश में 25 जून 1975 को लगे आपातकाल के दौरान नागरिकों की आजादी छीने जाने और विपक्ष की आवाज दबाए जाने के खिलाफ 24 वर्षीय नरेंद्र मोदी ने डटकर मुकाबला किया था। उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पूर्णकालिक प्रचारक रहे मोदी ने गिरफ्तारी से बचते हुए छिपकर काम किया, संविधान के पाठ आयोजित किए और पूरे गुजरात में आपातकाल-विरोधी साहित्य पहुँचाकर जन-जागरूकता फैलाई। उन्होंने इस कठिन दौर में लोकतंत्र की भावना को जिंदा रखने में एक असाधारण और महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।
बिना किसी संदर्भ पुस्तक के सिर्फ याददाश्त के सहारे 23 दिनों में पूरी की किताब, ठोस भोजन छोड़कर केवल नींबू पानी पर रहे निर्भर
वर्ष 1977 में जब आपातकाल समाप्त हुआ, तब युवा नरेंद्र मोदी ने उस पूरे संघर्ष को शब्दों में पिरोकर ‘संघर्ष मा गुजरात’ (गुजरात में संघर्ष) नामक पुस्तक लिखी। खास बात यह है कि इस ऐतिहासिक किताब को लिखने के दौरान उन्होंने 23 दिनों तक अन्न का एक भी दाना ग्रहण नहीं किया और केवल नींबू पानी के सहारे रहकर अपनी याददाश्त के बल पर पूरे दस्तावेज को तैयार किया, जिसमें उन गुमनाम आम भारतीयों के बलिदानों को दर्ज किया गया जिनका इतिहास में खो जाने का खतरा था।
गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूभाई जशभाई पटेल ने किया था पहला संस्करण जारी, आम लोगों के योगदान को बताया अमूल्य
इस महत्वपूर्ण पुस्तक का पहला संस्करण गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूभाई जशभाई पटेल द्वारा जारी किया गया था। इस अवसर पर मुख्यमंत्री पटेल ने कहा था कि इस किताब के जरिए इतिहास के उन पन्नों को सहेजा गया है जिन्हें सरकारी दस्तावेजों में अक्सर जगह नहीं मिलती, और यह रचना आपातकाल के काले दौर के असली संघर्ष को बयां करती है। यह किताब उन तमाम अनसंग हीरोज के संघर्ष की दास्तान है जिन्होंने तानाशाही के खिलाफ चुपचाप रहकर भी बहुत बड़ा योगदान दिया था।

