नयी दिल्ली, 15 सितंबर (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को ‘वाइल्डलाइफ एसओएस’ के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) कार्तिक सत्यनारायण की उस याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति व्यक्त की है, जिसमें उन्होंने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के तेंदुए के शिकार से जुड़े एक मामले में अपनी गिरफ्तारी से मिली अंतरिम राहत को वापस लेने के आदेश को चुनौती दी है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने इस मामले का उल्लेख करते हुए तत्काल सुनवाई और जांच में शामिल होने के दौरान सत्यनारायण को गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान करने की मांग की।
अधिवक्ता दवे ने पीठ को सूचित किया कि वाइल्डलाइफ एसओएस शिकार रोधी (एंटी-पोचिंग) गतिविधियों में लगी एक गैर-सरकारी संस्था (एनजीओ) है, जिसके प्रयासों से ही उत्तर प्रदेश के आगरा में तेंदुए की खालें बरामद की गई थीं। हालांकि, बाद में मध्य प्रदेश सरकार के संगठन के प्रमुख को ही इस मामले में संलिप्त कर आरोपी बना दिया गया।
उन्होंने कहा कि श्री सत्यनारायण जांच एजेंसी के समक्ष उपस्थित होने और जांच में पूरा सहयोग करने के लिए तैयार हैं, लेकिन उन्हें गिरफ्तारी के खिलाफ कानूनी संरक्षण की आवश्यकता है। पीठ ने याचिका को इसी सप्ताह सूचीबद्ध कर सुनवाई करने का आश्वासन दिया है।
यह मामला मध्य प्रदेश राज्य टाइगर स्ट्राइक फोर्स द्वारा श्योपुर और मुरैना जिलों में 10 तेंदुओं के कथित शिकार, खरीद और तस्करी को लेकर की जा रही जांच से जुड़ा है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर पीठ ने हाल ही में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत दायर दो याचिकाओं को खारिज करते हुए श्री सत्यनारायण को मिली अंतरिम राहत वापस ले ली थी और गैर-सहयोग का हवाला देते हुए उन्हें 21 सितंबर को एसटीएसएफ के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया था।
राज्य सरकार का आरोप है कि श्री सत्यनारायण ने जांच में सहयोग नहीं किया, तीसरे समन और अदालती गिरफ्तारी वारंट की जानकारी छिपाई तथा जांच में शामिल होने से बचते रहे। राज्य ने उन्हें ‘फरार’ भी बताया है। दूसरी ओर, वाइल्डलाइफ एसओएस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि अपने कानूनी अधिकारों के तहत सुरक्षा मांगना जांच में असहयोग करना नहीं है और संगठन जांच प्रक्रिया में सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है।
