भोपाल। MP में अब सड़कों पर दौड़ेगी ई-बसों की नई फौज… लेकिन सवाल है—कितने शहरों में आएंगी ये बसें? किराया कितना होगा? सरकार पर कितना खर्च आएगा? और डीजल बसों के मुकाबले इनका फायदा कितना है?
आइए समझते हैं MP की ई-बस क्रांति का पूरा गणित…
MP में कितने शहर, कितनी बसें?
मध्य प्रदेश में PM-eBus Sewa के तहत 6 शहरों—इंदौर, भोपाल, जबलपुर, ग्वालियर, उज्जैन और सागर—के लिए 582 ई-बसों की मांग दर्ज की गई थी।
वहीं केंद्र की हालिया स्वीकृति में MP के 8 शहरों—भोपाल, इंदौर, जबलपुर, सागर, ग्वालियर, सतना, देवास और उज्जैन—के लिए कुल 972 ई-बसें शामिल हैं।
यानी आने वाले समय में MP के शहरी सार्वजनिक परिवहन में इलेक्ट्रिक बसों की भूमिका तेजी से बढ़ने वाली है।
यात्री को कितना किराया देना होगा?
अब सबसे बड़ा सवाल—किराया।
भोपाल में शुरू हुई ई-बस सेवा में फिलहाल 7 से 40 रुपये तक किराया रखा गया है और AC यात्रा के लिए अलग से शुल्क नहीं है। (Amar Ujala)
हालांकि अलग-अलग शहरों और रूट के हिसाब से किराया अलग हो सकता है।
सरकार पर कितना खर्च?
PM-eBus Sewa का पूरा राष्ट्रीय बजट 57,613 करोड़ रुपये है, जिसमें केंद्र सरकार 20 हजार करोड़ रुपये का समर्थन दे रही है।
ई-बसों को चलाने के लिए केंद्र की ओर से प्रति किलोमीटर सहायता भी तय है—
12 मीटर बस के लिए 24 रुपये,
9 मीटर के लिए 22 रुपये और
7 मीटर बस के लिए 20 रुपये प्रति किलोमीटर।
यानी बस खरीदने का पूरा शुरुआती बोझ शहर सरकार पर डालने के बजाय PPP मॉडल में निजी ऑपरेटर भी बड़ी भूमिका निभाएगा।
डीजल बस से कितना फायदा?
ई-बस का सबसे बड़ा फायदा है—ईंधन और प्रदूषण में कमी।
डीजल बस में लगातार डीजल खर्च और इंजन से जुड़ा मेंटेनेंस होता है, जबकि ई-बस में पेट्रोलियम ईंधन की जरूरत नहीं होती।
सरकार खुद मानती है कि ई-बसों की ऑपरेशनल कॉस्ट कम है, हालांकि इनकी शुरुआती कीमत ज्यादा होती है।
यानी शुरुआती निवेश ज्यादा, लेकिन लंबे समय में संचालन खर्च कम—यही ई-बस मॉडल का सबसे बड़ा आर्थिक तर्क है।
लेकिन चुनौती क्या है?
अब तस्वीर का दूसरा पहलू…
बसें आ गईं तो चार्ज कहां होंगी?
इसके लिए डिपो में हाई-वोल्टेज लाइन, सब-स्टेशन और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी है। PM-eBus Sewa में Behind-the-Meter पावर इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए 100% केंद्रीय सहायता का प्रावधान है।
लेकिन चुनौती सिर्फ चार्जिंग की नहीं है।
बैटरी की क्षमता, चार्जिंग में लगने वाला समय, गर्मी-बारिश में प्रदर्शन, स्पेयर पार्ट्स और प्रशिक्षित तकनीकी स्टाफ—इन सभी का इंतजाम करना होगा।
तो साफ है— MP में ई-बस सिर्फ डीजल बस का विकल्प नहीं, बल्कि शहरों के पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बदलने की कोशिश है।
अब असली परीक्षा होगी—
क्या सरकार पर्याप्त चार्जिंग और मेंटेनेंस इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर पाएगी और क्या कम संचालन लागत का फायदा आखिरकार यात्रियों को भी मिलेगा?
