भोपाल। रत्नकरण्डक श्रावकाचार पर प्रवचन करते हुए आचार्य श्री समयसागर जी महाराज ने सम्यक दर्शन के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा कि सम्यक दर्शन के अभाव में न तो सम्यक ज्ञान प्राप्त हो सकता है और न ही सम्यक चारित्र का विकास संभव है। उन्होंने कहा कि सम्यक दर्शन के बिना मोक्ष का मार्ग भी दिखाई नहीं देता। इसलिए साधकों को अपनी श्रद्धा को सही दिशा में स्थापित करना चाहिए।
मीडिया प्रभारी भविष्य जैन ने बताया कि आचार्य श्री ने कहा कि तप से पुण्य का संचय हो सकता है, लेकिन जब तक उसके साथ सही भावना और दृढ़ संकल्प नहीं जुड़ा हो, तब तक उससे संवर और निर्जरा जैसे आध्यात्मिक परिणाम प्राप्त नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि संकल्प के बिना निर्जरा संभव नहीं है। धार्मिक साधना केवल बाहरी क्रियाओं तक सीमित न रहकर व्यक्ति की आंतरिक वृत्तियों में परिवर्तन लाने वाली होनी चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा कि व्रत तभी सार्थक होता है, जब उसे पापपूर्ण आचरण के त्याग के दृढ़ संकल्प के साथ ग्रहण किया जाए। उन्होंने श्रद्धालुओं से अपनी कमजोरियों को पहचानने और स्वयं का ‘डॉक्टर’ बनने का आह्वान किया। इसके लिए राग, द्वेष और कषाय जैसी आंतरिक प्रवृत्तियों को पहचानना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि बाहरी संयम को धीरे-धीरे आंतरिक संयम में परिवर्तित करना होगा। ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह आचरण और आत्मकल्याण का माध्यम बने। सम्यक्त्व की तुलना बीज से करते हुए उन्होंने कहा कि इसे श्रद्धा और पुरुषार्थ से सींचना आवश्यक है। केवल भगवान को मानना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलना भी जरूरी है।
समय के महत्व पर जोर देते हुए आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य जीवन के इस अनमोल अवसर का सार्थक उपयोग करते हुए व्यक्ति को सम्यक आचरण और मोक्ष के मार्ग की ओर आगे बढ़ना चाहिए।
