
इंदौर. स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 में दूसरे स्थान पर आने के बाद इंदौर के सामने अब रैंकिंग बरकरार रखने से बड़ी चुनौती शहर की हवा को साफ रखना है. डीएवीवी में ‘स्वच्छ हवा और सांस लेने का अधिकारः इंदौर में वायु प्रदूषण पर पुनर्विचार’ विषय पर हुई राउंडटेबल में विशेषज्ञों ने वायु प्रदूषण को स्वास्थ्य और नागरिक अधिकारों से जोड़ते हुए स्थानीय स्रोतों पर ठोस कार्रवाई की जरूरत बताई.
अमलतास विश्वविद्यालय, देवास के प्रो-चांसलर डॉ. सलील भार्गव ने कहा कि वायु प्रदूषण स्वास्थ्य आपातकाल बन चुका है. इसका असर फेफड़ों के साथ हृदय और मस्तिष्क पर भी पड़ता है. पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. दिलीप वागेला ने कहा कि सड़क की धूल, वाहनों का धुआं, निर्माण गतिविधियां, उद्योग और कचरा जलाना प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं. इंदौर और आसपास के क्षेत्र को एक एयरशेड मानकर वैज्ञानिक तरीके से प्रदूषण नियंत्रण की रणनीति बनाने की जरूरत है. डॉ. किशोर पवार ने हरित क्षेत्रों को संरक्षित करने पर जोर दिया. डॉ. ओपी जोशी ने पुराने वाहनों, निर्माण कार्य, कचरा जलाने और औद्योगिक उत्सर्जन पर प्रभावी नियंत्रण की जरूरत बताई. बहाई चेयर के प्रमुख डॉ. अराश फ़ज़ली ने कहा कि शहर की सफलता रैंकिंग से नहीं, बल्कि इस बात से तय होनी चाहिए कि हर नागरिक सुरक्षित हवा में सांस ले पा रहा है या नहीं.
