विंध्य की डायरी
डॉ रवि तिवारी
अपनी राजनैतिक सुझबूझ के कारण प्रदेश में हमेशा चर्चित रहे विंध्य में वर्षो बाद मुद्दों पर राजनीति का दौर अचानक शुरू हो गया है. अपनी रणनीतिक चूको के कारण हाशिए में पहुँच चुके विपक्ष ने एक बार फिर सत्ता की आँखों में आँखे डालकर सवाल पूछना शुरू कर दिया है. विपक्षी दलों में आए इस बदलाव को लेकर चिंतित सत्ता पक्ष अब इसके जबाब में सिस्टम को अपना हथियार बनाने से भी नही चूक रही.जननी कल्पना की मौत के कारणों पर पूरी तरह घिर चुकी विंध्य की लचर स्वास्थ्य सेवाओं में आयुष्मान का लगा ताला अब खुल चुका है. लोग भी यह समझने लगे हैं कि यह खेल अपनो को दूसरे रास्ते से मदद पहुचाने के लिए खेला जा रहा है.
आयुष्मान योजना में अब तक सामने आयी तमाम गड़बडिय़ों की चर्चा के बाद कहानी ऐसे बन्द हो जाती है , जैसे कुछ हुआ ही नही हो. सिरमौर चौराहे पर मौत के बाद लग रहा मजमा इसका भी एहसास करा रहा है कि यदि समय रहते इस लचर व्यवस्था को लेकर प्रयास किया जाता तो दर्जनों असमय हुई मौतों पर विराम लग जाता. भारतीय परम्परा के मुताबिक अभी कोई देर नही हुई है. अब भी यदि यह लड़ाई किसी निर्णायक स्तर पर जाकर समाप्त होती है तो भी आने वाले समय मे बहुत कुछ ठीक हो सकता है. हालांकि खेमो में बंटी विंध्य की राजनीति अपना रुख कब बदल लेगी इसकी भविष्यवाणी न कोई कर पाया है और न ही कोई कर सकता है.
सेवानिवृत्ति के बाद भी ओएसडी से मोहभंग नहीं
सत्ता के गलियारों में इन दिनों एक सवाल खूब तैर रहा है—आखिर सेवानिवृत्ति के बाद भी मंत्री के ओएसडी से मोहभंग क्यों नहीं हो पा रहा? पिछले सप्ताह ओएसडी अपने मूल विभाग शिक्षा से सेवानिवृत्त हो चुके हैं, लेकिन मंत्री के साथ उनकी सक्रियता को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है. खास बात यह है कि ओएसडी की कार्यप्रणाली को लेकर पहले से ही तरह-तरह की चर्चाएं होती रही हैं और उनका विशेष फोकस पुलिस महकमे से जुड़े मामलों पर रहने की बातें भी अक्सर सुनने को मिलती रही हैं.
मंत्री के जिले के दौरे की सूचना हो या कार्यक्रमों की तैयारी, चर्चा है कि ओएसडी कई बार मंत्री से पहले ही पहुंच जाते हैं और अधिकारियों के मोबाइल पर संदेशों का सिलसिला शुरू हो जाता है. संदेश किस उद्देश्य से होते हैं, किसके लिए होते हैं और उनका असर कितना होता है यह तो संबंधित अधिकारी ही बेहतर बता सकते हैं, लेकिन संदेशों का मतलब निकालने में सियासी गलियारे ज्यादा देर नहीं लगाते.
दिलचस्प यह भी है कि आलोचनाओं और चर्चाओं के बावजूद मंत्री और ओएसडी की जुगलबंदी में कोई खास फर्क दिखाई नहीं देता. ओएसडीके कभी-कभी निजी होटल में ठहरने की चर्चा भी सामने आती है इसका मुख्य कारण जिले के मुखिया ओएसडी को ज्यादा भाव नहीं दे रहे हैं जिले के मुखिया को ओएसडी के क्रियाकलापों एवं कुछ बड़े कार्यो में दखलअंदाजी भी चर्चा में रहता है. अब सवाल यही है कि जब मूल विभाग से रिटायरमेंट हो चुका है तो ओएसडी की भूमिका आखिर किस हैसियत से और कितने समय तक जारी रहेगी?
अभद्र टिप्पणी पर एक्शन
रीवा के गांधी मेमोरियल अस्पताल में प्रसूता और नवजात बच्चे की मौत के बाद परिजनों से अभद्रता के मामले में अस्पताल अधीक्षक डॉ. राहुल मिश्रा को पद से हटा दिया गया, शब्दों की मर्यादा भूलना महंगा पड़ गया. अपने स्वभाव से मजबूर डा. मिश्रा ने परिस्थितियों को भापने में चूक कर दी. हर हाथ में मोबाइल होता है उनको भी नही पता था कि समझाइश के समय जो वह बोल रहे है वह कैमरे में कैद हो जाएगा. घटना के बाद मृतका के परिजनों से मुलाकात के दौरान तत्कालीन अधीक्षक डॉ. राहुल मिश्रा का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वे परिजनों से बेहद असंवेदनशील और अभद्र भाषा में बात करते नजर आए थे . इसके बाद आक्रोश को हवा मिल गई . बढ़ते आक्रोश और वायरल वीडियो पर संज्ञान लेते हुए स्वास्थ्य विभाग ने यह कार्रवाई की. लेकिन अभी मामला ठंडा नही हुआ है.
