भोपाल। आचार्यश्री समयसागर जी महाराज ने कहा है कि जैन धर्म में सम्यक दर्शन का अर्थ केवल श्रद्धा रखना नहीं है, बल्कि आगम के अनुरूप सही दृष्टिकोण और आचरण को अपनाना भी है। धार्मिक प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा कि सम्यक दृष्टि वाले व्यक्ति को राग-द्वेष से प्रभावित देवताओं की पूजा नहीं करनी चाहिए और न ही सांसारिक वस्तुओं की कामना अथवा धर्मात्माओं के प्रति अनादर का भाव रखना चाहिए।
मीडिया प्रभारी भविष्य जैन ने बताया कि प्रवचन में उचित सम्मान और पूजा के बीच के अंतर को भी स्पष्ट किया गया। आचार्यश्री ने कहा कि चतुर्ष्णिकाय देव भले ही साधु नहीं होते, लेकिन वे जिनशासन की रक्षा और धार्मिक कार्यों में सहयोग कर सकते हैं। इसलिए उनके प्रति कृतज्ञता, विनम्रता और उचित सम्मान रखना अनुचित नहीं है, लेकिन उन्हें वीतरागी देवों के समान पूजा का पात्र नहीं माना जाना चाहिए।
आचार्यश्री ने कहा कि गुणों का सदैव सम्मान किया जाना चाहिए, जबकि वास्तविक पूजा उन्हीं की होनी चाहिए जो वीतरागता और मोक्ष के सच्चे मार्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं।
उन्होंने कहा कि पंचकल्याणक सहित धार्मिक आयोजनों में ऐसे देवों को उचित सम्मान दिया जा सकता है, क्योंकि वे धार्मिक कार्यों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सहयोगी हो सकते हैं। हालांकि सम्मान और पूजा दोनों अलग-अलग विषय हैं।
प्रवचन में यह भी कहा गया कि जैन आगमों के अनुरूप आचरण, दिगम्बरत्व और आध्यात्मिक अनुशासन के बिना केवल सम्यक दर्शन पर्याप्त नहीं है। आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं से पंच परमेष्ठी को अपनी आराधना का केन्द्र बनाने का आह्वान करते हुए कहा कि योग्य व्यक्ति का कभी अनादर नहीं करना चाहिए और गुणों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, लेकिन सर्वोच्च पूजा केवल सच्चे वीतरागी और मोक्षमार्ग के आदर्श की ही होनी चाहिए।
