
जनमत संग्रह यह तय नहीं करता है कि आइसलैंड यूरोपीय संघ में शामिल होगा या नहीं। पक्ष में बहुमत मिलने से सरकार को सदस्यता वार्ता फिर से शुरू करने का जनादेश मिल जायेगा, जबकि किसी भी अंतिम सदस्यता समझौते को एक अलग जनमत संग्रह में मतदाताओं के सामने रखना होगा। आइसलैंड ने वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान अपनी बैंकिंग प्रणाली ध्वस्त होने के बाद 2009 में यूरोपीय संघ में शामिल होने के लिए आवेदन किया था। सदस्यता वार्ता 2010 में शुरू हुई थी, लेकिन तीन वर्ष बाद यूरोपीय संघ की नीतियों की विरोधी सरकार के सत्ता में आने के बाद इसे निलंबित कर दिया गया था।
वर्ष 2015 में आइसलैंड सरकार ने यूरोपीय संघ को सूचित किया कि वह अब खुद को ईयू उम्मीदवार के रूप में नहीं देखना चाहता। यूरोपियन पॉलिसी सेंटर के अनुसार, यूरोपीय आयोग का मानना है कि आइसलैंड का सदस्यता आवेदन कानूनी रूप से वैध बना हुआ है और वार्ता को औपचारिक रूप से समाप्त करने के बजाय केवल निलंबित किया गया है। यह जनमत संग्रह ऐसे समय में हो रहा है, जब आइसलैंड यूरोप में व्यापक भू-राजनीतिक परिवर्तनों के बीच अपनी सुरक्षा और आर्थिक स्थिति का पुनर्मूल्यांकन कर रहा है। वहीं, यूरोपीय संघ के साथ घनिष्ठ एकीकरण से देश को लाभ होगा या उसकी संप्रभुता एवं प्रमुख संसाधनों पर नियंत्रण को नुकसान पहुंचेगा, इसे लेकर मतदाताओं के बीच मतभेद बने हुए हैं।
