मुंबई, (वार्ता) बॉम्बे उच्च न्यायालय कोर्ट ने पुणे में वैश्नवी हगवणे की आत्महत्या से जुड़े मामले में व्यवसायी बंधु फाटक को बरी कर दिया और कहा कि उनके खिलाफ आरोपी को पनाह देने का गुनाह करने के पर्याप्त सबूत नहीं हैं।
न्यायमूर्ति शिवकुमार डिगे ने पुणे सत्र अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पहले फाटक की मामले से बरी होने की अर्जी को खारिज कर दिया गया था।
सरकारी अधिवक्ता के मुताबिक फाटक ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के निकाले गए नेता राजेंद्र हगवणे को पवना बांध के पास एक फार्महाउस पर खाना और रहने की जगह दी थी। राजेंद्र हगवणे इस मामले में वांछित थे और फरार चल रहे थे। सरकारी पक्ष ने आरोपी को पनाह देने की इस घटना को ‘हार्बरिंग’ (अपराधी को पनाह देने) का अपराध माना था।
फाटक के अधिवक्ता प्रशांत पाटिल ने दलील दी कि केवल खाना या रहने की जगह देने से ही ‘हार्बरिंग’ का अपराध नहीं बनता। उन्होंने कहा कि सरकारी पक्ष को यह साबित करना चाहिए था कि फाटक को अपराध के बारे में पता था और उन्होंने जानबूझकर आरोपी को गिरफ्तारी से बचने में मदद की थी।
न्यायालय ने इन दलीलों पर विचार करने के बाद माना कि अपराध के लिए जरूरी शर्तें मौजूद नहीं हैं और इसलिए फाटक को इस मामले से बरी कर दिया।
गौरतलब है कि यह मामला वैश्नवी हगवणे की मौत से जुड़ा है, जिसके बाद पुलिस जांच हुई और कई लोगों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया।
राजेंद्र हगवणे भी आरोपियों में शामिल थे और जांच के दौरान फरार रहे थे। गत वर्ष 16 मई को वैश्नवी हगवणे (24) अपने ससुराल में छत के पंखे से लटकी हुई पाई गयी थीं। उनके परिवार ने आरोप लगाया था कि वैश्नवी को दहेज के लिए परेशान किया जाता था और उनके साथ घरेलू हिंसा होती थी।
