महाकौशल की उम्मीदें फिर हुईं धराशायी

महाकौशल की डायरी

हाल ही में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपनी कार्यकारिणी घोषित की है। राष्ट्रीय पदाधिकारियों की नियुक्ति में पहली बार मध्य प्रदेश को भरपूर प्रतिनिधित्व मिला है। इस बार प्रदेश के छह नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिली हैं, मगर भगवादल के सबसे मजबूत गढ़ महाकौशल और इसके मुख्यालय जबलपुर से किसी को भी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पदाधिकारी नहीं बनाया गया है। जबकि माना जा रहा था कि जबलपुर जैसे अहम जिले से कोई ना कोई भाजपा नेता राष्ट्रीय स्तर पर पदाधिकारी जरूर बनेगा, किन्तु इन उम्मीदों पर पानी फिर गया। भाजपा के प्रमुख नेता मंडला के मौजूदा सांसद और वरिष्ठ आदिवासी नेता फग्गन सिंह कुलस्ते को पदाधिकारी बनाए जाने की सबसे ज्यादा संभावना थीं।

कयास लगाए जा रहे थे कि महाकौशल के आदिवासी वर्ग को साधने के लिए पार्टी उन्हें कोई ना कोई जिम्मेदारी देगी लेकिन उन्हें पदाधिकारी नहीं बनाया गया। एक और वरिष्ठ नेता तथा प्रदेश के मौजूदा ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल के साथ ही जबलपुर के लोक निर्माण मंत्री और पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह को भी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह नहीं मिल सकी है।
जबलपुर से भाजपा की राष्ट्रीय टीम में एक भी नाम शामिल न होने पर सियासी गलियारों में तरह तरह की चर्चाएं गर्म हैं। सवाल उठ रहा है कि करीब 24 वर्षों में जबलपुर भाजपा का कोई नेता पार्टी के राष्ट्रीय संगठन में प्रमुख पदाधिकारी के रूप में जगह क्यों नहीं बना सका..?

भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष एवं खजुराहो सांसद विष्णु दत्त शर्मा को सभी प्रकोष्ठों का संकुल संयोजक बनाया गया है। भिंड के वरिष्ठ नेता लाल सिंह आर्य को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। मालवा-निमाड़, ग्वालियर-चंबल और बुंदेलखंड क्षेत्र के नेताओं को प्रतिनिधित्व मिला है। इसके विपरीत महाकौशल के सबसे बड़े शहर और राजनीतिक केंद्रबिंदु जबलपुर का खाता फिर नहीं खुल सका। स्मरण रहे कि जिले में भाजपा का मजबूत संगठन होने के साथ ही लोकसभा सीट पार्टी के पास है और स्थानीय नेताओं की प्रदेश संगठन व सरकार में सक्रिय भूमिका भी रही है। बावजूद इसके राष्ट्रीय स्तर पर जबलपुर की अनुपस्थिति लगातार बनी हुई है।

हर नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी के साथ यह सवाल फिर सामने आता है कि आखिर जबलपुर के नेताओं की राजनीतिक पहुंच दिल्ली तक क्यों नहीं बन पा रही। राजनीतिक हलकों में अब इस बात पर चर्चा है कि क्या जबलपुर में राष्ट्रीय स्तर का नेतृत्व तैयार नहीं हो पा रहा या फिर प्रदेश संगठन और सत्ता के समीकरणों में यहां के नेताओं को अपेक्षित समर्थन नहीं मिलता। राष्ट्रीय राजनीति में केवल जनाधार और वरिष्ठता ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि संगठनात्मक स्वीकार्यता, प्रदेश स्तर पर मजबूत समर्थन और दिल्ली तक राजनीतिक संपर्क भी अहम माने जाते हैं। ऐसे में यह चर्चाएं जोरों पर हैं कि क्या महाकौशल के नेताओं के लिए दिल्ली पहुंचने का राजनीतिक रास्ता भोपाल के समीकरणों से होकर गुजरता है और वहीं उनकी आगे की राजनीतिक संभावनाएं क्षीण हो जाती हैं..?

अफसरों पर फूटा विधायक का गुस्सा

बीते दिनों शहडोल के सोहागपुर जनपद कार्यालय के सभागार में पंचायत प्रतिनिधियों का सम्मेलन आयोजित हुआ। सम्मेलन में सहभागिता के लिए बड़ी संख्या में पंचायत प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया। प्रशासन के आमंत्रण से गदगद पंचायत के प्रतिनिधि बड़ी तादाद में सम्मेलन स्थल पहुंचे भी, मगर वहां पहुंचते ही उनमें आक्रोश भर गया। दरअसल जिस सभागार में आयोजन हुआ उसकी बैठक क्षमता महज 200 व्यक्तियों की थी और आमंत्रण जिले के 8000 पंचायत प्रतिनिधियों को भेजे गए। जाहिर है अव्यवस्था फैलना हीं थी और हुआ ही वही। अव्यवस्था से पंच – सरपंच इतने नाराज हो गए कि सभागार से निकलकर सीधे कलेक्ट्रेट पहुंचे और घेराव कर दिया।

वहां मौजूद अफसर पर उन्होंने सवाल दागे कि वह गांव के निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं और उनके लिए ही आयोजित सम्मेलन में उनके बैठने समेत अन्य सम्मानजनक व्यवस्थाएं क्यों नहीं की गईं। मामला तब और सरगर्म हो गया जब सम्मेलन में बतौर मुख्य अतिथि पहुंचीं विधायक मनीषा सिंह भी अपनी नाराजगी को रोक नहीं सकीं। उन्होंने अफसरों को जमकर फटकार लगाते हुए पूछा कि जब बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया तो फिर उसके अनुरूप व्यवस्थाएं सुनिश्चित क्यों नहीं की गईं। चर्चा तो यह भी रही कि जनप्रतिनिधि और विधायक इसलिए भी क्रोधित हुए की सभागार में जिला पंचायत सीईओ सहित अन्य संबंधित अधिकारी मौजूद नहीं रहे। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि इतने बड़े सम्मेलन का आयोजन किसके भरोसे किया गया..? बहरहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मामले में किसी की जिम्मेदारी तय भी होती है या फिर इसे एक कमी मानकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।

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