बालाघाट:मध्य प्रदेश के बालाघाट जिला तीन दशकों तक लाल आतंक का दंश झेलता रहा । लेकिन 12 दिसंबर 2025 को सरकार की तय डेडलाइन से करीब साढ़े तीन महीने पहले ही नक्सल मुक्त हुआ. ऐसे में करीब 8 महीनों से सरेंडर नक्सली पुलिस की निगरानी में पुनर्वास केंद्रों में रह रहे हैं । इनमें से 10 पूर्व नक्सली कपड़े सिलने की ट्रेनिंग ली । वहीं, तीन राज्यों की तीन नक्सली कमांडरों को अलग से रखा गया है । इनमें नक्सलियों के केबी डिवीजन का प्रमुख सुरेंद्र उर्फ कबीर, केबी डिवीजन का सचिव राकेश होड़ी और जीआरबी डीवीजन का डीवीसीएम रैंक का नक्सली छोटा दीपक उर्फ सुधाकर उइके शामिल है । ऐसे में समाज में मिलनसार हो जाए इसलिए उन्हें धीरे-धीरे ग्रामीण अंचलों में तिरंगा यात्रा के माध्यम से ले जाया जा रहा है ।
गांव पहुंची तिरंगा यात्रा
तिरंगा यात्रा पूर्व नक्सली कमांडर दीपक के गांव पालाघोंदी पहुंची, तब नजारा देखने लायक था । यहां पर जैसे दीपक पहुंचा, तो गांव के लोगों की भीड़ उसे देखने के लिए उमड़ पड़ी. उधर, भीड़ से बेटा संतोष भी आया और पिता दीपक के पैर छूने लगा । मेल मिलाप का समय चल ही रहा था कि भाई को देख दीपक भी भावुक हो गया ।
सालों से राखी नहीं बांधी, अब भाई को देख हुई भावुक
पूर्व नक्सली कमांडर दीपक उइके अपने गांव पहुंचा तो मालेगांव में रहनी वाली बहन की आंखें भर गई. उनकी बहन का नाम जीतो मरकाम है । उनका कहना है कि वह अपने भाई दीपक से करीब 35 साल बाद मिली । इतने सालों बाद मिलकर भाई को देख खुश हो गई । वह चाहती थी कि भाई सरेंडर कर दे. लेकिन कोई ऐसा न था कि मैसेज पहुंचा दे । भाभी और भतीजा भी संगठन में चले गए थे । भतीजा तो लौट आया लेकिन भाभी मुठभेड़ में दुनिया से चली गई. बहुत बुरा लगता था , लेकिन भाई ने सरेंडर किया तो अच्छा लगा । ऐसे में हर साल रक्षाबंधन में भाई की याद आती थी , ऐसे में सालों बाद फिर से भाई को राखी बांधने की इच्छा पूरी हुई।
दीपक के छोटे भाई महेश उइके भी अपने भाई से मिलकर काफी खुश है । वह कहते हैं कि उन्हें याद नहीं कि वह नक्सल संगठन से कैसे जुड़े , लेकिन जब से वह संगठन में गया तब के बाद मुलाकात मुश्किल हुई. सालों बाद भाई से मुलाकात हुई थी बड़ी खुशी हुई । डर लगता था कि कही भाभी की तरह भी भाई छोड़ कर न चला जाए। पुलिस हमेशा आती और डांटती थी कि अपने भाई से कहो कि सरेंडर कर ले किसी दिन पुलिस की गोली का शिकार न जाए ।
तीन साल पहले हुई थी मुलाकात
महेश बताते हैं कि आखिरी मुलाकात तीन साल पहले हुई थी. तब कहा था कि सब छोड़ कर आ जाओ । इसमें कुछ नहीं रखा है पुलिस भी परेशान करती है । लेकिन वह नहीं माना । वह कहता था कि हम इधर ही लड़ाई लड़ेंगे । लड़ाई किस बात की तो वह कहते हैं गांव- जनता की भलाई की लड़ाई करनी है । ऐसे में वह नहीं माने तो हम भी लौट आए ।
कैसे नक्सली बना दीपक
दीपक ने बताया कि 1994 में मेरी उम्र 20 साल थी। तब नक्सलियों की मीटिंग में शामिल होने लगा था । उनके बनाए स्थानीय संगठन से जुड़ गया । लेकिन, वह नक्सल संगठन नहीं था. उस संगठन का नाम DKAMS था यानी दंडकारण्य किसान आदिवासी मजदूर संगठन से जुड़ने के बाद गांवों में पोस्टर और पर्चे बांटना और लोगों को अधिकारों के लिए इकट्ठा होने के लिए प्रेरित करने का काम था । बाद में मैं संगठन का अध्यक्ष भी बना , तब फोर्स (सुरक्षाबलों) की नजर में आ गया । जब DKAMS का अध्यक्ष था, तब सक्रियता को देख पुलिस अक्सर मुझे उठा लेती थी ।
एक बार इसी संगठन के कुल्पा गांव के रहने वाले 35 लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया और जमकर पिटाई की । इस दौरान एक की मौत हो गई । इसके बाद मेरा झुकाव नक्सली विचारधारा की तरफ होने लगा । प्रशासन से नफरत सी हो गई । एक दिन मालेगांव में मुझे, हीरालाल और जान सिंह को पुलिस ने सुबह खेत से हिरासत में ले लिया , इस दौरान पुलिस ने बहुत पिटाई की । वहां से छूटने के बाद मैं पत्नी के साथ सीधे जंगल की ओर चला गया । 1998 से लेकर 12 दिसंबर 2026 तक जंगल की जिंदगी जी , हालांकि, पत्नी जमुना बाई उइके साल 2019 में मुठभेड़ के दौरान मारी गई ।
