
जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट ने अपने एक अहम आदेश में कहा है कि निष्पादित सरकारी अनुबंध को बिना कारण बताओ नोटिस और सुनवाई का अवसर दिए एकतरफा निरस्त नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने टीकमगढ़ के सब हेल्थ सेंटरों में हाउस कीपिंग सेवाओं से जुड़े अनुबंध को रद करने का आदेश निरस्त करते हुए वर्क आर्डर और अनुबंध बहाल कर दिया। साथ ही राज्य के संबंधित अधिकारियों को याचिकाकर्ता पर10 हजार रुपये की लागत तय की। एक्टिंग विवेक रूसिया व जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने यह आदेश स्काईबुल सिक्योरिटी सर्विस ओपीसी प्राइवेट लिमिटेड की रिट अपील पर सुनाया।
अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता अमित कुमार सिंह सेंगर ने पक्ष रखा। मामला टीकमगढ़ जिले के सब हेल्थ सेंटरों में हाउसकीपिंग सेवाओं के लिए जारी टेंडर का है। टेंडर प्रक्रिया में दो बोलीदाता पात्र पाए गए और दोनों की दर समान होने पर ड्रा आफ लाट्स से अपीलकर्ता कंपनी का चयन किया गया। 11 फरवरी 2026 को वर्क आर्डर जारी हुआ और 12 फरवरी को औपचारिक अनुबंध निष्पादित किया गया। कंपनी को सात दिन में परफार्मेंस बैंक गारंटी जमा करनी थी। कंपनी का कहना था कि बैंकिंग पोर्टल में तकनीकी समस्या के कारण वह समय पर गारंटी जमा नहीं कर सकी। उसने 14 फरवरी को आठ दिन की मोहलत मांगते हुए अभ्यावेदन दिया, लेकिन अधिकारियों ने उस पर कोई निर्णय नहीं लिया। इसके बाद 20 फरवरी को वर्क आर्डर और अनुबंध समाप्त कर दिया गया। यह कार्रवाई बिना शो-काज नोटिस और सुनवाई के की गई। हाईकोर्ट ने कहा कि कंपनी ने एक दिन की देरी के बाद बैंक गारंटी जमा की थी और देरी ऐसी प्रकृति की नहीं थी, जो पूरे अनुबंध को समाप्त करने का आधार बने। सक्षम प्राधिकारी को विलंब माफ करने की शक्ति थी और कंपनी के अभ्यावेदन पर विचार किया जाना चाहिए था। कोर्ट ने यह भी कहा कि निष्पादित अनुबंध को रद करने से पहले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन जरूरी था। हाईकोर्ट ने एकलपीठ का छह जुलाई 2026 का आदेश व 20 फरवरी का समाप्ति आदेश निरस्त करते हुए 11 फरवरी का वर्क आर्डर और 12 फरवरी का अनुबंध बहाल कर दिया।
