
इंदौर. दहेज प्रताड़ना के मामले में 42 साल पहले साध्वी बन चुकी महिला समेत तीन रिश्तेदारों पर लगाए गए आरोप अदालत में टिक नहीं सके. अपर सत्र न्यायालय ने रिकॉर्ड की जांच के बाद तीनों के खिलाफ निचली अदालत द्वारा तय किए गए आरोप निरस्त कर दिए.
मामला एरोड्रम थाने में दर्ज दहेज प्रताड़ना की शिकायत से जुड़ा है. इसमें पति के राजस्थान निवासी भाई-भाभी और बहन को भी आरोपी बनाया था. पुलिस ने जांच के बाद चालान पेश किया था, जिसके आधार पर प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत ने आरोप तय किए थे. इसके खिलाफ अपर सत्र न्यायालय में रिवीजन पेश किया. बचाव पक्ष की ओर से एडवोकेट महेंद्र मौर्य ने कोर्ट को बताया कि पति की बहन ने वर्ष 1980 में बाल साध्वी के रूप में सांसारिक जीवन छोड़ दिया था. इसके बाद उसका परिवार से संपर्क नहीं रहा और वह शिकायतकर्ता की शादी में भी शामिल नहीं हुई थी. बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि राजस्थान में रहने वाले जेठ-जेठानी भी शिकायतकर्ता की शादी में शामिल नहीं हुए थे. इसके बावजूद उन्हें दहेज प्रताड़ना के मामले में आरोपी बनाया गया. तर्क दिया गया कि आरोपियों की शिकायतकर्ता से संपर्क और कथित प्रताड़ना की वास्तविक स्थिति की पर्याप्त जांच नहीं हुई. अपर सत्र न्यायाधीश मनीष लोवंशी ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि साध्वी, जेठ और जेठानी द्वारा शिकायतकर्ता को दहेज के लिए प्रताड़ित करने का कोई ठोस प्रमाण नहीं है. यह भी स्पष्ट नहीं है कि कथित प्रताड़ना कब, कहां और किस तरह की गई. कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा आरोप तय करने के आदेश में त्रुटि मानते हुए साध्वी समेत तीनों आरोपियों के खिलाफ तय आरोप निरस्त कर दिए.
