धर्मेंद्र सिंह चौहान
इंदौर: वक्त गुजरता गया… पीढ़ियां बदलती गईं, शहर की तस्वीर भी बदली, मगर इंदौर की सरजमीं पर खड़े ये दो पेड़ आज भी इतिहास के उस दौर को अपने भीतर समेटे हैं, जब 1857 की क्रांति ने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी थी। एक नीम और दूसरा बरगद। इनके सामने आज एक यक्ष खड़ा है। वह इतिहास से सवाल करता है और फिर उसी सवाल को आज की पीढ़ी के सामने रख देता है। जिस आजादी में तुम आज सांस ले रहे हो, वह तुम्हें ऐसे ही नहीं मिली… इसकी कीमत किसने चुकाई थी?
यक्ष का पहला सवाल नीम से है, तुमने क्या देखा था?
नीम जैसे अपनी शाखाएं हिलाकर 10 फरवरी 1858 के उस दिन में लौट जाता है। वह कहता है, मैंने अमझेरा के राजा बख्तावर सिंह को यहां पर बेबस खड़े देखा था। क्योंकि उन्होंने पराधीनता स्वीकार करने के बजाय विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष का मार्ग चुना था। अपनी धरती और स्वाभिमान के लिए लड़ते रहे। अंग्रेजों ने उन्हें बंदी बनाया और मेरी ही डाल पर फांसी पर लटका दिया। उनके प्राण चले गए, लेकिन उनका संकल्प नहीं झुका। आज उसी शहादत की स्मृति में मेरे नीचे बख्तावर सिंह की प्रतिमा है। नीम अब भी वहीं है-मौन, लेकिन उस वीरता का साक्षी। उसकी शाखाएं जैसे आज भी याद दिलाती हैं कि स्वतंत्रता किसी उपहार से नहीं, संघर्ष और बलिदान से मिली थी।
नीम से करीब दो किलोमीटर दूर बरगद खड़ा है। दूरी ज्यादा नहीं, मगर इन दोनों पेड़ों के बीच इतिहास का एक लंबा सफर है। यक्ष अब उसी बरगद के पास पहुंचता है और पूछता है—और तुमने क्या देखा?
बरगद की शाखाओं में जैसे बीते दौर की एक दर्दनाक दास्तान फिर जीवित हो उठती है। वह कहता है, मैंने सआदत खान को देखा था… वह शख्स जिसने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत का परचम बुलंद किया। रेजीडेंसी के विद्रोह के बाद वह लंबे अरसे तक अंग्रेजों की गिरफ्त से दूर रहे। आखिरकार पकड़े गए, मुकदमा चला और मेरी ही डाल पर उन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। आज रेजीडेंसी परिसर में वही बरगद खड़ा है। उसके ठीक नीचे सआदत खान की याद में बना ओटला मौजूद है। शहर बदल गया, रास्ते बदल गए, लेकिन बरगद की शाखाओं में वह दास्तान अब भी महफूज है। दोनों पेड़ों की कहानियां अलग हैं, समय अलग है, लेकिन दोनों के भीतर एक ही भावना है, गुलामी के खिलाफ खड़े होने का साहस।
यक्ष अब पेड़ों से नहीं, आज की पीढ़ी से सवाल करता है, सोशल मीडिया और रीलों की दुनिया में जी रही जेन-जी… क्या तुम जानते हो कि तुम्हारी आजादी की राह में बख्तावर सिंह ने अपने प्राण और सआदत खान ने अपनी जान कुर्बान की थी? शायद इनके पास इस सवाल का जवाब नहीं। वे तो सिर्फ सोशल मीडिया और रीलों की दुनिया में जी रहे हैं। और शायद यही उसे ही अपनी सबसे बड़ी विरासत मानते है, यक्ष कहता है, आजादी हमें विरासत में मिली है, लेकिन उसे पाने वालों की कहानी भी विरासत में मिलनी चाहिए।
