इंदौर: आजादी का पर्व… जेल का खुलता दरवाजा… हाथों में सामान की छोटी-सी गठरी और आंखों में अपनों से मिलने की बेचैनी. शनिवार को स्वतंत्रता दिवस पर सेंट्रल जेल के बाहर का माहौल कुछ ऐसा ही था. एक-एक कर 11 बंदी जेल से बाहर आए तो किसी के चेहरे पर वर्षों बाद परिवार से मिलने की खुशी थी, तो किसी की आंखें उन साथियों से बिछड़ने के दर्द से नम थीं, जिनके साथ उन्होंने जिंदगी के कई साल सलाखों के पीछे बिताए.
शनिवार को जेल का दरवाजा उनके लिए सिर्फ एक लोहे का दरवाजा नहीं था. उसके बाहर उनके लिए आजादी, परिवार और जिंदगी को नए सिरे से शुरू करने का मौका खड़ा था. सलाखों के पीछे बिताए वर्षों की कड़वी यादें साथ थीं, लेकिन आंखों में अब एक ही सपना था, बीती जिंदगी से सीख लेकर आगे की जिंदगी बेहतर बनाना. जेल से बाहर निकलते ही किसी ने सबसे पहले परिवार को तलाशा तो कोई कुछ पल चुपचाप खड़ा होकर खुले आसमान को निहारता रहा।
उनके लिए 15 अगस्त सिर्फ देश की आजादी का दिन नहीं था, बल्कि उनकी जिंदगी का भी एक नया अध्याय शुरू होने का दिन था. वर्षों तक जेल की चारदीवारी के भीतर रहने के बाद अब उनके सामने खुली सड़क, अपना घर और परिवार था.नव भारत से बातचीत में रिहा हुए बंदियों ने अपने जीवन के वे पन्ने खोले, जिन्हें याद करना भी आसान नहीं था. किसी की जिंदगी जमीन के विवाद में आए एक पल के गुस्से ने बदल दी तो किसी को पत्नी की आत्महत्या के मामले में वर्षों जेल में रहना पड़ा. कुछ ने ऐसे अपराध की सजा काटी, जिसमें बाद में सबूतों के अभाव में उन्हें दोषमुक्त किया. इन सभी की कहानियों में एक बात समान है, एक पल का फैसला जिंदगी के कई साल छीन सकता है.
वह एक पल… जिसने जिंदगी बदल दी
रिहा हुए बंदियों से बात करने पर बार-बार एक ही बात सामने आई—काश, उस दिन गुस्से पर काबू कर लिया होता. उनका कहना था कि अपराध के समय इंसान गुस्से में होता है, लेकिन गुस्सा कुछ देर बाद खत्म हो जाता है. इसके बाद शुरू होता है उस फैसले का लंबा परिणाम, जो कई बार पूरी जिंदगी बदल देता है. जेल में बिताए वर्षों ने उन्हें यह एहसास कराया कि आवेश का वह एक पल परिवार, रिश्ते और भविष्य सब कुछ छीन सकता है. सबसे बड़ी तकलीफ उन्हें सजा से ज्यादा परिवार से दूर रहने की रही. त्योहार, बच्चों की जिंदगी के अहम पड़ाव और अपनों की जरूरत के समय वे उनके साथ नहीं थे. अब जेल से निकलते समय उनकी आंखों में पछतावे के साथ एक संकल्प भी था, दोबारा ऐसी गलती नहीं करेंगे.
सलाखों के पीछे समझी आजादी की कीमत
जेल में रहते हुए जिन चीजों को सामान्य जिंदगी का हिस्सा समझा जाता था, वही उनके लिए सबसे बड़ी खुशी बन गईं. परिवार के साथ बैठकर खाना, अपनों से बात करना, सुबह खुले आसमान के नीचे निकलना और अपनी मर्जी से जिंदगी जीना, इन छोटी-छोटी खुशियों की कीमत उन्होंने जेल की चारदीवारी में समझी. रिहा हुए बंदियों ने कहा कि अब वे मेहनत कर परिवार का सहारा बनना चाहते हैं. उनका कहना था कि जेल ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया है और अब वह सीख जिंदगीभर साथ रहेगी.
रिहा बंदियों की जुबानी… अपराध, सजा और पछतावे की कहानी
राजू गंगाराम ने बताया कि पत्नी को थप्पड़ मारने के बाद उसने आत्महत्या कर ली थी. इस घटना के बाद उसे वर्षों जेल में रहकर सजा काटनी पड़ी. राजू के लिए जेल से बाहर निकलने का दिन अपने अतीत को पीछे छोड़कर नई शुरुआत करने का दिन था. पर्वत जमीन के विवाद में अपने भाई कैलाश की हत्या के मामले में जेल गया था. बाहर निकलते समय उसने कहा कि भगवान किसी से ऐसा अपराध न करवाए. जेल में रहकर उसने जो खोया, उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है. खरगोन में रहने वाले कमल भी खेती को लेकर हुए विवाद में हत्या के मामले में जेल पहुंचा. अब उसका कहना है कि वह अपराध की दुनिया से दूर रहकर अच्छा नागरिक बनना चाहता है और परिवार के साथ शांतिपूर्ण जिंदगी बिताएगा. परदेशीपुरा में रहने वाले श्यामलाल ने बताया कि राजनीति विवाद में हुई हत्या के मामले में वह जेल पहुंचा. उसके अनुसार बाद में सबूतों के अभाव में वह बेगुनाह साबित हुआ, लेकिन तब तक जिंदगी के कई साल जेल में गुजर चुके थे. इंदौर में ही रहने वाले गणेश ने बताया कि पिता शंकर के साथ उसे भी हत्या का आरोपी बना दिया था. उसका कहना था कि उसने अपराध नहीं किया था, लेकिन मामले की कार्रवाई के दौरान उसे भी जेल में रहना पड़ा. झाबुआ निवासी बबला रत्ना ने भी गांव में हुई हत्या के मामले में जेल की सजा काटी. उसके अनुसार सबूतों के अभाव में वह बेगुनाह साबित हुआ, लेकिन जेल में बीते साल वापस नहीं लौट सकते.
जेल से निकले तो साथियों से बिछड़ने का दर्द भी था
रिहाई की खुशी के बीच जेल के भीतर बने रिश्तों को पीछे छोड़ने का दर्द भी बंदियों के चेहरों पर दिखाई दिया. वर्षों तक साथ रहने वाले बंदियों से विदा लेते समय कई भावुक हो गए. जेल में साथ खाना, काम करना और मुश्किल वक्त में एक दूसरे का सहारा बनना उनके जीवन का हिस्सा रहा था. अब बाहर निकलते समय वे उन साथियों को पीछे छोड़ रहे थे, जिनके साथ जिंदगी का लंबा हिस्सा गुजारा था.
जेल अधीक्षक दिनेश नरगावे ने नव भारत को बताया कि रिहा हुए सभी बंदियों को आगे का जीवन अपराध से दूर रहकर जिम्मेदार नागरिक के रूप में बिताने की सीख दी. उपजेल अधीक्षक संतोष लड़िया सहित जेल अधिकारियों ने भी उन्हें शुभकामनाएं दीं. जेल में काम कर अर्जित की गई राशि भी रिहा बंदियों को सौंपी गई.
