आजादी के महानायक पिता-पुत्र ने धधकाई थी क्रांति की ज्वाला

जबलपुर: संस्कारधानी की धरती वीरों और महावीरों की भूमि है। अमर शहीद राजा शंकरशाह और उनके पुत्र कुंवर रघुनाथ शाह ने आजादी की ऐसी अलख जगाई थी कि अंग्रेजी शासन की नीव हिल गई थी। अंग्रेज हुकूमत ने 14 सितम्बर 1857 को पिता और पुत्र को गिरफ्तार किया था और बंदीगृह में अस्थाई जेल बनाकर कैद किया था । 17 सितम्बर 1857 को पिता-पुत्र को मौत की सजा सुनाते वक्त कहा गया कि यदि वह माफी मांग ले तो सजा माफ कर दी जाएगी। अंग्रेजों ने उनके सामने धर्म बदलने, अंग्रेजी सत्ता को स्वीकार करने और माफी मांगने की शर्त रखी और इसे मान लेने पर उनकी रिहाई के लिए तैयार थे। लेकिन दोनों पिता-पुत्रों ने अंग्रेजों के इस प्रस्ताव को बहादुरी के साथ ठुकरा दिया था और कहा कि तोप से उड़ाने के बाद भी यदि वे बच गये तो फिर से अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ गीत लिखेंगे और अपने राष्ट्र की रक्षा के लिए विद्रोह करेंगे।

मौत के डर से बेखौफ पिता-पुत्र ने अंग्रेजी अदालत में कहा था कि हम ठग, पिंडारी, चोर, लुटेरे, डाकू और हत्यारे नहीं हैं, जो हमें फांसी दी जाये, हम गोंडवाना के राजा हैं। इसलिए हमें तोप के मुंह से बांधकर मृत्युदंड दिया जाये। अंग्रेजों ने दोनों पिता-पुत्रों को बंदी बनाकर तीन दिनों तक मुकदमें का नाटक करते हुए बगैर कोई मुकदमा चलाये 18 सितम्बर 1857 को उच्च न्यायालय के पास जबलपुर में प्रात: 11 बजे तोप के मुंह पर बांधकर मृत्युदंड दे दिया था। राजा शंकरशाह और कुंवर रघुनाथ शाह को अंग्रेज तोप से उड़ाकर क्रांति कि चिंगारी बुझाना चाहते थे, लेकिन चिंगारी बुझने के बजाय धधक उठी थी। 52वीं रेजीमेंट के सैनिकों ने पिता-पुत्र की शहादत की रात को ही विद्रोह कर दिया था। क्रांति की ऐसी ज्वाला धधकाई, जिससे अंग्रेजों को भारत छोडऩा पड़ा था। पूरा मप्र अंग्रेजों को खदेडऩे के लिए उठ खड़ा हुआ था। उन्हीं के त्याग और तपस्या की वजह से भारत देश अंग्रेजों से आजाद हुआ। पिता-पुत्र की शहादत और बलिदान हमें देश प्रेम और अपनी संस्कृति की रक्षा की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने अंग्रेजों से धरती की आन, बान, शान के लिए संघर्ष किया और स्वयं को बलिदान करते हुए नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्त्रोत बने। देश और धर्म की रक्षा के लिये अंग्रेजों से लड़ते हुये अपने प्राणों की आहुति देने पिता-पुत्र का बलिदान हमेशा अविस्मरणीय और प्रेरणादायक रहेगा।
कविताओं से जगाई क्रांति, कहते थे हमें कोई भी गुलाम नहीं बना सकता
राजा शंकरशाह और उनके पुत्र रघुनाथ शाह अंग्रेजी शासन की दमनकारी नीतियों के खिलाफ अपने विचारों और कविताओं के माध्यम से भी लोगों में आजादी के लिए जोश व उत्साह भरते थे। उनकी कविताओं से अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह की आग सुलग उठी थी। राजा शंकर शाह एक अलग मिट्टी के बने हुए थे जहाँ बड़े-बड़े शासक अंग्रेजों की धाक के आगे अपनी आवाज नहीं उठा पाते थे, वहीं राजा शंकर शाह न केवल डंके की चोट पर अपनी बात रखते थे, बल्कि कविताओं और गीतों के माध्यम से पूरे आदिवासी अंचल में राष्ट्रीयता की अलख जगाते थे। राजा शंकर शाह व कुंवर रघुनाथ शाह ने अंग्रेजों से कहा था कि यदि इस धरती ने हमें जन्म दिया है, तो हमें अंग्रेज ही क्या कोई भी गुलाम नहीं बना सकता। अंग्रेज उनके विद्रोह को बर्दाश्त नहीं कर पाये और कायरता का परिचय दिया था। राजा शंकर शाह-कुंवर रघुनाथ शाह के पूर्वज लगभग एक हजार साल तक शासन किये, उनके शासन ने इस धरती को बहुत कुछ दिया।
वीरगति से पहले आजादी, ब्रिटिश सत्ता को उखाडऩे जनता में भरा था जोश-
गोंडवाना राजा शंकरशाह ने मौत सामने होने के बाद भी वहां मौजूद जनता को आजादी और ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने का जोश पैदा करने वाली कविता सुनाया। मलेच्छों का मर्दन करो, कालिका माई। मूंद मुख डंडिन को, चुगली को चबाई खाई, खूंद डार दुष्टन को, शत्रु संहारिका। वहीं कुंवर रघुनाथ शाह ने भी उच्च स्वर में छंद सुनाया-कालिका भवानी माय अरज हमारी सुन, डार मुंडमाल गरे खड्ग कर धर लें। छंद पूरा होते ही जनता ने राजा व कुंवर के सम्मान में जयकारे लगाये। इसके बाद डिप्टी कमिश्नर ई. क्लार्क डर गया और उसने तुरंत तोप में आग लगवा दी थी।

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