नयी दिल्ली, 07 अगस्त (वार्ता) देश में मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण से नौ करोड़ हेक्टेयर जमीन भूमि प्रभावित है। इससे सबसे अधिक प्रभावित राज्य राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, और कर्नाटक है। केंद्र शासित प्रदेशों में लद्दाख पहले स्थान पर है।
यह जानकारी संसद के पटल पर रखे एक सवाल के जवाब में दी गयी। कृषि मंत्रालय से पूछा गया था कि मानव-जनित भूमि क्षरण के कारण कृषि उपज में हानि का ब्यौरा क्या है।
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने बताया कि देश में मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण की राज्यवार स्थिति दर्शाने वाले आंकड़ों के अनुसार, कुल 9,78,54,851 हेक्टेयर भूमि क्षरण से प्रभावित है। देश भर में इस समस्या से सबसे अधिक प्रभावित शीर्ष पांच राज्यों में राजस्थान पहले स्थान पर है, जहां सर्वाधिक 2,12,37,669 हेक्टेयर भूमि प्रभावित है। इसके बाद महाराष्ट्र 1,43,06,029 हेक्टेयर के साथ दूसरे और गुजरात 1,02,48,057 हेक्टेयर के साथ तीसरे स्थान पर है। जबकि कर्नाटक 69,59,847 हेक्टेयर के साथ चौथे स्थान पर मौजूद है। केंद्र शासित प्रदेशों में लद्दाख 71,11,968 हेक्टेयर के साथ पहले पायदान पर है।
देश के मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण एटलस (2021) के अनुसार, वर्ष 2018-19 तक देश में 6.38 लाख हेक्टेयर मरुस्थलीकृत और भूमि क्षरित क्षेत्र मानव जनित गतिविधियों के कारण प्रभावित हुआ है। उन्होंने बताया कि सरकार ने क्षरण से प्रभावित कृषि भूमि और फसल उत्पादकता पर इसके प्रभाव का अलग से कोई आकलन नहीं किया है, फिर भी कृषि क्षेत्र में फसल उत्पादकता और समग्र उत्पादन में निरंतर वृद्धि दर्ज की गई है।
उन्होंने बताया कि देश में खाद्यान्न पैदावार वर्ष 2014-15 में 252.03 मिलियन टन से बढ़कर वर्ष 2024-25 में 357.73 मिलियन टन हो गई है। इसी अवधि के दौरान बागवानी उत्पादन 280.98 मिलियन टन से बढ़कर 370.73 मिलियन टन पर पहुंच गया है।
कृषि उत्पादकता में सुधार और मृदा स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने कई स्थान-विशिष्ट प्रौद्योगिकियों की सिफारिश की है। इनमें अंतरफसल, फसल चक्रण, संरक्षण कृषि, मल्चिंग, हरित खाद और कृषि वानिकी शामिल हैं।
लवण प्रभावित मिट्टी के प्रबंधन के लिए जिप्सम प्रयोग, बायो-ड्रेनेज, उप-सतह जल निकासी और लवण सहनीय फसल की किस्मों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके साथ ही, मृदा परीक्षण फसल प्रतिक्रिया और सामान्य उर्वरक सिफारिशों से संतुलित पोषक तत्वों के उपयोग और मृदा जैविक कार्बन बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। जल संरक्षण के लिए चेक डैम, खेत तालाबों और एकीकृत वाटरशेड प्रबंधन का सहारा लिया जा रहा है।
इसके अलावा सरकार जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए 651 जिलों में ‘जलवायु अनुकूल कृषि में राष्ट्रीय नवाचार’ (एनआईसीआरए) परियोजना चला रही है। इन जिलों के लिए जिला कृषि आकस्मिकता योजनाएं (डीएसीपी) तैयार की गई हैं। पहचाने गए 310 अतिसंवेदनशील जिलों में से 201 को ‘उच्च’ और 109 को ‘बहुत उच्च’ श्रेणी में रखा गया है। एनआईसीआरए के तहत 28 राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के 151 अतिसंवेदनशील जिलों के 448 गांवों में जलवायु अनुकूल प्रौद्योगिकियों जैसे धान गहनता प्रणाली (एसआरआई), धान की सीधी बुवाई और खेत में ही (इन-सीटू) फसल अवशेष प्रबंधन का प्रदर्शन किया जा रहा है। पिछले दस वर्षों (2014-2024) में जारी 2900 फसल किस्मों में से 2661 किस्मों को जैविक और अजैविक दबावों के प्रति सहनशील बनाया गया है।
श्री ठाकुर ने बताया कि सतत खेती और किसानों के जोखिम प्रबंधन के लिए विभिन्न योजनाओं को क्रियान्वित किया जा रहा है। ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ योजना से सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप व स्प्रिंकलर) को बढ़ावा मिल रहा है, जबकि वर्षा सिंचित क्षेत्र विकास योजना एकीकृत कृषि प्रणाली को प्रोत्साहन देती है। परंपरागत कृषि विकास योजना और राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के जरिए जैविक व प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके अलावा, फसल विविधीकरण के लिए दलहन आत्मनिर्भरता मिशन और राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन लागू हैं, जबकि प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना कार्यरत हैं।
ग्रामीण स्तर पर प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और जल सुरक्षा के लिए ‘विकसित भारत – गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन – ग्रामीण’ (वीबी-जी राम-जी) के तहत स्वीकृत 318 कार्यों में से 110 कार्य जल संरक्षण से संबंधित हैं। इसके अतिरिक्त, भूमि संसाधन विभाग द्वारा ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’ (डब्ल्यूडीसी-पीएमकेएसवाई) के तहत वर्षा सिंचित और निम्नीकृत भूमि के विकास के लिए रिज एरिया ट्रीटमेंट, ड्रेनेज लाइन ट्रीटमेंट, मृदा व नमी संरक्षण और वर्षा जल संचयन जैसे कार्य किए जा रहे हैं, जिससे किसानों की जलवायु अनुकूलन क्षमता में सुधार हो रहा है।
