राहुल गांधी के कड़े तेवरों के बीच जेन-जी पर संघ का बड़ा दांव

प्रवेश कुमार मिश्र

नई दिल्ली .
संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा जेन जी व छात्र आंदोलन के संदर्भ में दिए गए बयान को लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में जबरदस्त चर्चा हो रही है. कहा जा रहा है कि संघ प्रमुख ने सोची-समझी बहुआयामी रणनीति के तहत जहां एक तरफ केंद्र सरकार को आईना दिखाते हुए मौजूदा असंतोष के बीच वैचारिक रक्षा कवच प्रदान करने का प्रयास किया है वहीं दूसरी ओर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा युवाओं के मुद्दों पर लगातार गढ़े जा रहे आक्रामक और तीखे नैरेटिव की काट खोजने का प्रयास किया है.

उल्लेखनीय है कि मुंबई के युवा सम्मेलन में सरसंघचालक का यह कहना कि आंदोलित युवाओं को देश-विरोधी मानना गलत है और उनकी शिकायतें पूरी तरह जायज हैं, भारतीय राजनीति के बदलते समीकरणों की ओर इशारा करता है.

राजनीतिक जानकार बता रहे हैं कि उक्त वक्तव्य सत्ता की नीतियों से पूर्ण सहमति का दस्तावेज नहीं, बल्कि देश के मौजूदा सामाजिक-आर्थिक हालातों की एक व्यावहारिक और साहसिक स्वीकारोक्ति है. संघ भली-भांति समझता है कि पेपर लीक, बेरोजगारी और शिक्षा प्रणाली की खामियों के कारण देश की नई पीढ़ी के भीतर एक गहरा असंतोष पनप रहा है. इस गुस्से को केवल राष्ट्रवाद के पारंपरिक चश्मे से देखना या बलपूर्वक दबाना आत्मघाती साबित हो सकता है. संभवतः इसीलिए आंदोलनों को लोकतंत्र में सहमति बनाने का जरिया बताकर संघ ने एक तरफ जहां युवाओं के खिसकते विश्वास को वापस पाने का प्रयास किया है, वहीं दूसरी तरफ सरकार को युवाओं से दोबारा सीधे संवाद स्थापित करने का एक सुरक्षित राजनैतिक अवसर भी प्रदान कर दिया है.कहा जा रहा है कि संघ प्रमुख ने बहुत ही रणनीतिक ढंग से युवाओं को अपने लोग और अगली पीढ़ी बताकर उस नैरेटिव की हवा निकाल दी है जो हर छात्र आंदोलन को सीधे तौर पर देश-विरोधी ताकतों से जोड़ देता है. इससे सरकार पर लगने वाले दमनकारी और तानाशाही होने के आरोपों की धार बेहद कमजोर हो जाती है. इतना ही नहीं संघ प्रमुख का बयान राहुल गांधी के नेतृत्व में युवाओं के मुद्दों पर अत्यंत आक्रामक रुख अपनाए हुए खेमे की काट के रूप में भी देखा जा रहा है. राहुल गांधी लगातार युवाओं को यह संदेश देने में सफल हो रहे हैं कि वर्तमान सत्ता उनकी आवाज दबा रही है और युवाओं के आर्थिक अवसरों को सीमित कर रही है. संघ प्रमुख का यह कदम विपक्ष के इसी राजनैतिक नैरेटिव को बेअसर करने की एक बड़ी रणनीतिक बिसात है, जिसने युवाओं के गुस्से पर विपक्ष के एकाधिकार को पूरी तरह चुनौती दे दी है.
भागवत ने युवाओं को आंदोलन करने के संवैधानिक तरीकों और डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के ऐतिहासिक भाषणों की याद दिलाकर यह स्पष्ट संदेश दिया है कि विरोध रचनात्मक होना चाहिए न कि अराजक होने चाहिए. यह विपक्ष द्वारा चलाए जा रहे संविधान बचाओ आंदोलन को उसी के वैचारिक हथियार से जवाब देने का सार्थक प्रयास के रूप में देखा जा रहा है.
राजनीतिक प्रेक्षक कह रहे हैं कि लंबे समय बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने खुद को केवल सरकार के साथ कंधे में कंधा मिलाकर चलने वाले धारणा से अलग कर समाज के एक निष्पक्ष और सजग प्रहरी के रूप में प्रस्तुत किया है.
बहरहाल, भागवत ने सामाजिक और पीढ़ीगत बदलाव को स्वीकारोक्ति प्रदान करते हुए इस तथ्य को रेखांकित किया कि पुरानी पीढ़ी जहां बड़ों की बातों को बिना सवाल किए मान लेती थी, वहीं आज की जेन जी और जेन अल्फा तार्किक जवाब चाहती है. इतना ही नहीं जब देश में विभिन्न छात्र आंदोलनों और पुलिसिया कार्रवाई को लेकर बहस छिड़ी हो, तब संघ प्रमुख का यह स्पष्ट करना कि विरोध प्रदर्शन भी लोकतंत्र में संवाद का ही एक माध्यम है, व्यवस्था के भीतर सुधार की गुंजाइश को मान्यता देता है

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