जबलपुर: मप्र हाईकोर्ट में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण से जुड़े मामलों की मंगलवार को 14 वें दिन सुनवाई हुई। जस्टिस आनंद पाठक व जस्टिस विनय सराफ की विशेष युगलपीठ के समक्ष ओबीसी वर्ग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने लंबी बहस की। सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा कि यदि आरक्षण से किसी वर्ग को परेशानी है तो आरक्षण ही समाप्त कर दिया जाए और इसके स्थान पर कक्षा एक से 12वीं तक सरकारी स्कूल में पढ़े छात्रों को ही सरकारी नौकरी में प्राथमिकता देने का नियम बनाया जाए। उन्होंने आरक्षण व्यवस्था के साथ सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता और मेरिट को लेकर भी महत्वपूर्ण सुझाव रखे। अब बुधवार पांच अगस्त को मामले में अंतिम बहस होने की उम्मीद है।
मामले की सुनवाई के दौरान मेरिट को लेकर चर्चा के बीच वरिष्ठ अधिवक्ता ठाकुर ने कहा कि उन्होंने सरकार को कई बार सुझाव दिया है कि यदि आरक्षण से किसी वर्ग को परेशानी है तो आरक्षण ही समाप्त कर दिया जाए। इसके स्थान पर नियम बनाया जाए कि कक्षा एक से 12वीं तक सरकारी स्कूल में पढऩे वाले विद्यार्थियों को ही सरकारी नौकरी के लिए पात्र माना जाए। उनके अनुसार इससे सभी वर्गों के लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाएंगे और शिक्षा व्यवस्था में समानता आएगी।
जस्टिस आनंद पाठक ने भी सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर चिंता जताई। उन्होंने अपने ग्वालियर कार्यकाल के दौरान चली विद्या दान पहल का उल्लेख किया, जिसमें अधिकारी, आईआईटी से शिक्षित लोग और समाज के अन्य लोग सरकारी स्कूलों में जाकर बच्चों को पढ़ाते थे। उन्होंने बताया कि उस दौरान इंदौर के कलेक्टर सहित कई अधिकारी और शिक्षित लोग बच्चों को पढ़ाने पहुंचते थे। जस्टिस शील नागू ने भी इस पहल में पढ़ाने की इच्छा जताई थी। कोरोना काल के कारण यह पहल बंद हो गई। मामले की सुनवाई आज फिर जारी रहेगी।
