जबलपुर: हत्या के आरोप में जिला न्यायालय द्वारा आजीवन कारावास की सजा से दंडित किया जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गई थी। हाईकोर्ट जस्टिस विवेक अग्रवाल तथा जस्टिस ए के सिंह युगलपीठ ने अपील की सुनवाई के दौरान मृतक की मौत के समय तथा एफआईआर में गंभीर विसंगतियां पाते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए अपीलकर्ताओं को दोषमुक्त कर दिया।
अपीलकर्ता तुलसी राम राजपाल तथा हर प्रसाद की तरफ से दायर अपील में कहा गया था कि उन पर आरोप है कि उन्होंने घर में घुसकर प्यारेलाल गडरिया की चाकू से हमला कर हत्या कर दी थी। घटना के समय बिजली की आपूर्ति बंद थी और रोशनी का कोई स्रोत उपलब्ध नहीं था। मनगढ़ंत चश्मदीद गवाह के वयान घटना के 15 से 30 दिन बाद दर्ज किये गये। मृतक के परिजनों के द्वारा उन्हें झूठा फंसाया गया है।
युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि दोनो पक्षो के द्वारा प्रस्तुत की दलील की सुनवाई करते हुए गंभीर विसंगतियां सामने आई हैं। जांच अधिकारी ने एफआईआर खुद नही लिखी थी और सिर्फ उसमें उनके हस्ताक्षर थे। ट्रायल कोर्ट के समक्ष वह यह नही बता की किस आरक्षक ने एफआईआर दर्ज की थी। रिपोर्ट लिखने वाले व्यक्ति का बयान ट्रायल कोर्ट के सामने दर्ज किया जाना चाहिये था। एफआईआर दर्ज करवाते समय प्यारेलाल ज़िंदा थे या नहीं इस पर भी संदेह है। उनके बेटे ने अपने वयान में कहा है कि पुलिस स्टेशन से बाहर निकलने के बाद उनके पिता की मौत हुई थी। उनकी मॉ का कहना है कि अस्पताल पहुँचने तक प्यारेलाल ज़िंदा थे। एफआईआर दर्ज करवाते समय प्यारेलाल ज़िंदा थे और पुलिस ने उनकी मेडिकल जांच के लिए कोई अनुरोध दाखिल नहीं किया। यह एक ज़रूरी दस्तावेज़ है जिसके आधार पर मृतक की मेडिकल जांच की जानी थी। डॉक्टर ने अपने वयान में कहा है कि वह प्यारेलाल को उपचार के लिए अस्पताल लाया गया तो उनकी मौत हो गयी थी। उन्होने इस संबंध में पुलिस को सूचित किया था।
चार्ज-शीट के साथ उस मेडिकल जांच के अनुरोध संबंधित दस्तावेज़ पेश नही करने से बचाव पक्ष की इस दलील को और बल मिलता है कि प्यारेलाल ने एफआईआर दर्ज नहीं कराई थी। पुलिस स्टेषन पहुॅचने से पहले उनकी मौत हो गयी थी। रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद यह स्पस्ष्ट नही होता है कि एफआईआर में वास्तव में अंगूठे के निशान प्यारेलाल के है। ट्रायल कोर्ट ने लापरवाही से कुछ असंबंधित दस्तावेज़ पर गलत तरीके से भरोसा किया है। जिसके आधार पर आरोपियों को दोषी ठहराया गया है। युगलपीठ ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए अपीलकर्ताओ को दोषमुक्त कर दिया
