नयी दिल्ली, 02 अगस्त (वार्ता) ऐसे समय में जब पलायन, पहचान और अपनेपन की भावना वैश्विक चर्चाओं में छायी हुई है, चित्रकार एवं कलाकार योलांडा पेन्या माजोनी और शाना सूद का मानना है कि कला में उस तरह से सहानुभूति और सांस्कृतिक समझ बनाने की शक्ति है जैसी राजनीति अक्सर नहीं कर सकती। उनकी संयुक्त प्रदर्शनी, ‘मिरर्स : डिस्टेंस बिटवीन वर्ल्ड्स’, अलग-अलग महाद्वीपों की दो ऐसी कलाकारों को एक साथ लाती है, जिनकी कृतियां स्मृति, विरासत और घर की तलाश के साझा विषयों पर एक साथ आती हैं। सुश्री योलांडा पेन्या माजोनी क्यूबन-अमेरिकन चित्रकार हैं तो सुश्री शाना सूद दिल्ली मूल की हैं, जो अमेरिका रहती हैं।
इन दोनों के जीवन की शुरुआत हालांकि दुनिया के विपरीत छोरों पर हुई है, लेकिन दोनों कलाकारों ने पाया कि उनका काम व्यक्तिगत कहानियों के जरिये संस्कृति को सहेजने की एक समान इच्छा से संचालित होता है। सुश्री योलांडा पेन्या माजोनी ने कहा, “हमने जल्दी ही पाया कि हमारी कलाकृतियां एक ही इरादे से शुरू होती हैं- गहरी व्यक्तिगत कहानियों के जरिये संस्कृति को सहेजने के साथ। चाहे मैं सिगार बनाने वाले किसी क्यूबाई कारीगर की कलाकृति बना रही हूं, हवाना में सजने-संवरने का खेल खेलती किसी छोटी बच्ची का या फिर बारिश से भीगी सड़क का, मैं स्मृति, जीजीविषा और पहचान की कहानियां बयान कर रही होती हूं।”
सुश्री योलांडा का काम उनके परिवार की क्यूबाई और स्पेनिश विरासत में निहित है। यह प्रदर्शनी पीढ़ियों के पलायन व जीजीविषा को दर्शाती है। सिगार रोलर्स, संगीतकारों, नर्तकों और हवाना के परिवारों को समेटने वाले उनके कैनवस संस्कृति को अतीत का कोई अवशेष नहीं, बल्कि एक जीवित और विकसित होती हुई चीज मानते हैं। क्यूबा के बदलते सामाजिक परिदृश्य पर विचार करते हुए वे कहती हैं कि आम लोगों की जीजीविषा ही उन्हें लगातार प्रेरित करती है। उन्होंने कहा, “क्यूबा की सबसे बड़ी ताकत हमेशा से यहां के लोग और उनकी रचनात्मकता, जीजीविषा, गर्मजोशी और कठिन समय में भी परंपराओं को सहेजकर रखने की क्षमता रही है।” उन्होंने कहा, “संस्कृति अक्सर कठिनाई के दौर में भी बनी रहती है।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी कलाकृतियां उन लोगों का उत्सव मनाती हैं, जिनका दैनिक जीवन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद चलता रहता है जैसे सार्वजनिक चौराहों पर प्रस्तुति देने वाले संगीतकार, पीढ़ियों पुरानी शिल्प कला का अभ्यास करने वाले कारीगर और परंपराओं को जीवित रखने वाले परिवार। भारत से दूर रहने वाली सुश्री शाना के लिए दूरी ने उनके काम करने के तरीके और घर के प्रति उनकी समझ दोनों को नया आकार दिया है। जगहों का दस्तावेजीकरण करने के बजाय, वह यादों से बने भावनात्मक परिदृश्यों को चित्रित करती हैं। उन्होंने कहा, “भारत से दूर रहने से मुझे यह सीख मिली है कि स्मृति कोई संग्रह नहीं है। यह हमारे साथ विकसित होती है। मेरी कलाकृतियां भारत के दस्तावेजीकरण के बारे में कम और यह समझने के बारे में अधिक हैं कि दूरी किस तरह पहचान को नया रूप देती है।”
दोनों कलाकारों के काम में महिलाओं का स्थान केंद्रीय है। नायक के रूप में नहीं, बल्कि परिवार, परंपरा और जीजीविषा के शांत संरक्षकों के रूप में। सुश्री योलांडा ने कहा, “जिन महिलाओं को मैं चित्रित करती हूं, वे आम महिलाएं हैं, जिनकी ताकत पर अक्सर ध्यान नहीं जाता।” उन्होंने कहा कि संस्कृति को अक्सर माताओं, दादियों, बेटियों और कारीगरों के साधारण जीवन के जरिये सहेजा जाता है। सुश्री शाना भी इसी भावना को दोहराती हैं और कहती हैं, “वह उन शांत भावनात्मक दुनियाओं की ओर आकर्षित होती हैं, जहां महिलाएं रहती हैं और मानती हैं कि साधारण जीजीविषा में भी उतना ही सौंदर्य है।”
पलायन हालांकि बार-बार आने वाला विषय है, लेकिन दोनों में से कोई भी कलाकार अपनी कला को राजनीतिक टिप्पणी के रूप में नहीं देखता है। इसके बजाय, वे उन कहानियों में मानवीयता को बहाल करना चाहते हैं, जो अक्सर भू-राजनीतिक बहसों तक सीमित होकर रह जाती हैं।
सुश्री योलांडा ने कहा, “एक कलाकार के रूप में, मैं राजनीतिक रुख के बजाय मानवीय अनुभवों पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश करती हूं। सरकारी नीतियों से परे, अक्सर आम लोग ही होते हैं, जो सबसे बड़ी कठिनाइयों का सामना करते हैं।” उनका तर्क है कि संस्कृति उन मतभेदों को मिटा सकती है, जिन्हें राजनीति अक्सर और गहरा कर देती है। उन्होंने कहा, “कला लोगों तक बौद्धिक स्तर पर पहुंचने से पहले भावनात्मक स्तर पर पहुंचती है। कला हमें हमारे मतभेदों पर चर्चा शुरू करने से बहुत पहले अपनी साझा मानवता को पहचानने का अवसर देती है।”
सुश्री योलांडा के लिए सांस्कृतिक आदान-प्रदान स्वयं समझ की प्रक्रिया है। वे कहती हैं, “सांस्कृतिक आदान-प्रदान और साझा संघर्ष लोगों को एक-दूसरे को बेहतर ढंग से समझने में मदद करते हैं।”
सुश्री शाना भी इस विश्वास को साझा करती हैं और उनका तर्क है कि कला पूर्वाग्रह या किसी को आंकने के बजाय सहानुभूति के लिए जगह बनाती है। उन्होंने कहा, “कला हमसे किसी को आंकने से पहले ध्यान से देखने को कहती है। यह निश्चितता के बजाय जिज्ञासा को आमंत्रित करती है। एक कलाकृति संघर्ष को सुलझाने में भले ही सक्षम न हो, लेकिन यह हमें याद दिला सकती है कि किसी दूसरे व्यक्ति का अनुभव भी हमारे अपने अनुभव की तरह ही जटिल और परतों से भरा है। दृष्टिकोण में यही बदलाव सहानुभूति की शुरुआत है।”
कलाकार घर की पारंपरिक अवधारणाओं को भी चुनौती देते हैं। सुश्री योलांडा के लिए, घर भूगोल के बजाय परंपराओं, संगीत, भाषा और परिवार के माध्यम से आगे बढ़ता है। उन्हें उम्मीद है कि भावी पीढ़ियां जहां भी रहें, अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए सार्थक जीवन का निर्माण कर सकती हैं।
सुश्री शाना अपनेपन को राष्ट्रीयता के बजाय स्मृति और संबंधों से आकार लेने वाली वस्तु के रूप में देखती हैं। उन्होंने कहा, “मुझे उम्मीद है कि घर का वास्तव में क्या अर्थ है, दर्शक इसकी व्यापक समझ लेकर यहां से लौटेंगे। घर केवल कोई देश या पता नहीं है। यह वह भाषा है, जो हमें सुकून देती है, वे अनुष्ठान हैं- जिन्हें हम बिना सोचे दोहराते हैं, वे लोग हैं जो हमें आकार देते हैं और वे यादें हैं, जो हमारे जाने के बहुत बाद तक हमारे साथ रहती हैं।”

