संजय गांधी अस्पताल की लचर स्वास्थ्य व्यवस्था, बना रेफर सेंटर

रीवा: अवर्षा से जहा किसान परेशान हैं वहीं इस समय घर-घर मौसमी बीमारी का प्रकोप है. सर्दी जुखाम, बुखार, डेंगू, पीलिया आदि बीमारी से मरीज ग्रस्त है. लिहाजा संजय गांधी अस्पताल एवं सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में पैर रखने तक की जगह नही है. इसी तरह निजी अस्पताल में भी मरीजों का तांता लगा हुआ है.शासकीय अस्पताल में बेहतर उपचार के अभाव में मरीज निजी अस्पताल और क्लीनिक पहुंच रहे है. सरकारी डाक्टरों को अस्पताल में मरीज देखने की फुर्सत नही है. यही वजह है कि बेहतर उपचार के लिये रीवा से मरीज जबलपुर-नागपुर जा रहे है.

तमाम सुविधा एवं मशीने होने के बाद भी शहर के शासकीय अस्पताल में उपचार एक कठिन संघर्ष बन चुका है जो चिकित्सक सुपर अस्पताल एवं संजय गांधी अस्पताल में मरीज का उपचार कर सकते है वह खुद मरीजों को निजी नर्सिंग होम उपचार के लिये भेज रहे हैं जहा से मोटी कमाई होती है. हालत यह है कि कभी जिला चिकित्सालय में एक्सरे फिल्म नही तो कभी संजय गांधी अस्पताल में दवा का टोटा, सुपर अस्पताल में अगर कोई मरीज आयुष्मान कार्डधारी है और उसे पेशमेकर या अन्य उपकरण लगाना है तो वह अस्पताल में नही है. मरीजों को इतना परेशान किया जाता है कि वह अस्पताल से खुद को रेफर करा लेते है. इस समय मौसमी बीमारी के चलते सुपर अस्पताल के ओपीडी में प्रतिदिन तीन सौ से पांच सौ मरीज पहुंच रहे है. वही संजय गांधी अस्पताल की ओपीडी में 1800 से 2000 मरीज पहुंचते है. जिसमें से लगभग दो सौ मरीज भर्ती होते है. अस्पताल से मरीजों की छुट्टी भी होती रहती है. वरिष्ठ चिकित्सक वार्ड में कम जाते है और पूरा अस्पताल जूनियर डाक्टरों के हवाले रहता है. यही वजह है कि स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है.
जांच के नाम पर कमीशन का पूरा खेल
संजय गांधी अस्पताल एवं सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में पदस्थ चिकित्सक अपने निजी एवं शासकीय आवास में मरीजों को देखते है. अस्पताल के लिये भले ही फुर्सत न मिले, लेकिन अपने घरों में मरीजों को बकायदे फीस लेकर देखते है और फिर शुरू होता है जांच के नाम पर कमीशन का पूरा खेल. दरअसल जब कोई मरीज पहुंचता है तो विभिन्न तरह की जांच संदेह के आधार पर लिख दी जाती है. कई जांचे तो इतनी मंहगी होती है कि आम आदमी के बस में नही होती. जांच का पर्चा देने के साथ बकायदे संबंधित जांच केन्द्र का पर्चा भी दिया जाता है कि संबंधित पैथालाजी, एक्सरे या एमआरआई आदि सेंटर में जाकर ही जांच कराए. इसके साथ ही दवा दुकान का भी पर्चा दिया जाता है कि दवा इसी दुकान से खरीदें, अगर जांच और दवा अन्य जगह से ली जाती है तो तरह-तरह के संदेह खड़ा करते हुए दोबारा जांच के लिये लिख दिया जाता है. दरअसल यह पूरा खेल चिकित्सकों के कमीशन का होता है. जितनी जांच होती है उसका बकायदे कमीशन पहुंचता है.
मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है: अधीक्षक
संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय के अधीक्षक डा. राहुल मिश्रा ने बताया कि इस समय अस्पताल में मरीजों की संख्या ज्यादा है. मौसमी बीमारी के कारण मरीज ज्यादा पहुंच रहे है. दवा एवं उचार की सुविधा बराबर मिल रही है. इसके साथ ही वरिष्ठ चिकित्सक भी वार्ड में मरीजों को देखते है कुछ समस्याएं जरूर है

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