नयी दिल्ली, 30 जुलाई (वार्ता) पिछले कुछ वर्षों में संरचनात्मक एवं प्रतिस्पर्धा-समर्थक सुधारों के दम पर भारत बाजार विकृतियों को दूर करने वाले देशों की रैंकिंग में 25 पायदान की छलांग लगाकर 57वें स्थान पर पहुंच गया है। कॉम्पीटीयर फाउंडेशन द्वारा गुरुवार को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2010 से 2023 के बीच बाजार विकृतियों को कम करने और प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने में हुई प्रगति के कारण यह संभव हो सका है। “भारत के विकास का अगला मोर्चा: प्रतिस्पर्धा को हतोत्साहित करने वाली बाजार विकृतियों को कम करके साल 2010 से 2023 के दौरान सुधार की दिशा में प्रगति को आगे बढ़ाना” शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इस दौरान भारत ने कई संरचनात्मक एवं प्रतिस्पर्धा-समर्थक सुधार किये।
इस रिपोर्ट में बाजार विकृति प्रदर्शन सूचकांक के आधार पर भारत के प्रदर्शन का आकलन किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बाजार विकृतियों को कम करने और प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने के लिए किये गये निरंतर प्रयासों के कारण देश की रैंकिंग में सुधार हुआ है। इस रिपोर्ट का विमोचन यहां इंडिया हैबिटेट सेंटर में सेंटर फॉर ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट लॉ (सीटीआईएल) और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन ट्रेड (आईआईएफटी) ने कॉम्पीटीयर फाउंडेशन फॉर ट्रेड एंड कॉम्पिटिशन पॉलिसी के सहयोग से किया। चर्चा में देश की संरचनात्मक सुधार यात्रा, प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए अपनायी गयी नीतियों तथा बदलते वैश्विक व्यापारिक परिवेश में सतत विकास बनाये रखने के लिए आवश्यक अगले चरण के सुधारों पर विचार-विमर्श किया गया।
रिपोर्ट में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), दिवाला एवं दिवालियापन संहिता (आईबीसी), नियामकीय वातावरण में सुधार तथा व्यापार सुविधा प्रणालियों के आधुनिकीकरण जैसे प्रमुख सुधारों को रेखांकित किया गया है। इसके अलावा, रिपोर्ट में प्रतिस्पर्धा, निवेश वातावरण, डिजिटल बाजारों तथा देश की प्रतिस्पर्धात्मकता और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भागीदारी को प्रभावित करने वाली बाहरी नियामकीय बाधाओं से संबंधित विकासक्रम का भी विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि प्रतिस्पर्धा नीति में साक्ष्य-आधारित एवं परिणाम-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना, उपभोक्ता कल्याण के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों में निवेश संबंधी प्रतिबंधों की समीक्षा करना तथा अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नियामकीय बाधाओं को दूर करने के लिए समान विचारधारा वाले व्यापारिक साझेदारों के साथ सहयोग बढ़ाना आवश्यक है।

