दतिया : दोनों दलों को सबोटेज का खतरा

ग्वालियर चंबल डायरी

हरीश दुबे

यह कम ही लोगों को पता होगा कि देश की आजादी के बाद दतिया को मध्यभारत राज्य के बजाए विंध्य प्रदेश का हिस्सा बनाया गया था। जब 56 में राज्यों के पुनर्गठन में कई छोटे राज्यों का विलय कर मध्यप्रदेश बनाया गया तो दतिया क्षेत्रफल के लिहाज से उस समय के सबसे छोटे जिले के रूप में मप्र में शामिल किया गया। बहरहाल, आजादी के बाद 52 से लेकर अब तक दतिया विधानसभा क्षेत्र में 16 चुनाव हुए हैं, जिनमें सर्वाधिक बार (नौ दफा) कांग्रेस ही जीती है। जनसंघ दो बार, भाजपा चार बार और सपा एक मर्तबा जीती। बहरहाल, इस बार जैसा दिलचस्प, रोमांचक और कांटे का चुनाव पहले कभी नहीं हुआ। राजनीति के धुरंधर पंडित भी भरोसे के साथ आंकलन नहीं लगा पा रहे हैं कि 26 के इस उपचुनाव में जीत का सेहरा किसके सिर बंधेगा और किसे हार का सितम झेलना होगा। हाल के वर्षों में यह पहला उपचुनाव है जिसमें पूरी सरकार डटी रही। सीएम तीन बार आए, पूरे चुनाव अभियान की कमान भाजपा और कांग्रेस के सूबा सदरों ने संभाली। ऐसा लगा जैसे अब बुंदेलखंड का यह जिला ही मप्र की राजनीति का भाग्यविधाता बनने जा रहा है। प्रत्याशी के नाम का ऐलान होने वाले दिन शाम तक खुद को सुनिश्चित उम्मीदवार मानकर जनसंपर्क और सभाओं में जुटे डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने के बाद भाजपा को कांग्रेस से भिड़ने के पहले अपनी ही पार्टी में डैमेज कंट्रोल पर ज्यादा मेहनत करनी पड़ी। डॉ. मिश्रा को उम्मीद थी कि इस बार विधायक बनकर वे इसी सीट पर चार बार विधायक रहे कांग्रेस के स्व. श्यामसुन्दर श्याम के रिकॉर्ड की बराबरी कर लेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हां, वे स्व. श्यामसुंदर के पुत्र राजेन्द्र भारती की तरह तीन बार विधायक जरुर रहे। डॉ मिश्रा के साथ यह प्लस प्वाइंट जरूर है कि श्यामसुंदर श्याम और राजेंद्र भारती लगातार तीन बार विधायक कभी नहीं रहे, लगातार इतनी बार जीतने का रिकॉर्ड नरोत्तम ने ही रचा है। नरोत्तम के डबरा छोड़कर दतिया आने के बाद कांग्रेस के कुंवर घनश्याम सिंह दतिया छोड़कर पड़ोसी सीट सेबढ़ा चले गए थे लेकिन नरोत्तम का टिकट कटा तो कुंवर कांग्रेस से प्रत्याशी बनने के लिए तैयार हो गये। भाजपा की ही तरह कांग्रेस को भी भितरघात रोकने के लिए डैमेज कंट्रोल के लिए खासा वर्कआउट करना पड़ा। भाजपा द्वारा ब्राह्मण प्रत्याशी मैदान में उतारने के बाद कांग्रेस में अवधेश नायक एकदम से महत्त्वपूर्ण हो गए और उन्हें मनाने के लिए जीतू पटवारी को कई बार उनके घर जाना पड़ा तो दिग्विजय ने पिछली बार उनका टिकट कटने के लिए खुद को जिम्मेदार मानते हुए भरी सभा में उनसे माफी मांगी। निवर्तमान विधायक राजेंद्र भारती भी कांग्रेस के पूरे प्रचार अभियान में रूठे रूठे से रहे।

 

चेंबर : पदाधिकारी बना रहे स्वतंत्र पहचान

 

तो क्या ग्वालियर चंबल अंचल के व्यापारियों की सबसे बड़ी संस्था मप्र चेंबर ऑफ कॉमर्स से हाउसों का वजूद पूरी तरह खत्म हो गया है या होने जा रहा है, व्यापारी हलकों में यही चर्चा है। चेंबर चुनाव में इस बार कोई भी हाउस दमदारी नहीं दिखा सका। अध्यक्ष पद पर जहां व्हाइट हाउस के प्रत्याशी को करारी शिकस्त मिली वहीं क्रिएटिव ने इस शीर्ष पद के लिए प्रत्याशी ही मैदान में नहीं उतारा था। हाउसों की अभेद्य दीवारों के टूटने का अहसास चेंबर की नई टीम के कार्यभार ग्रहण समारोह में हुआ जब व्हाइट के तीन और क्रिएटिव के दोनों विजयी प्रत्याशियों ने निर्दलीय डॉ प्रवीण अग्रवाल के साथ कदमताल करते हुए सिर्फ व्यापारियों के हको हकूक की हिफाजत के लिए काम करने का संकल्प दोहराया। सच्चाई यह है कि विष्णु गर्ग और सतीश अजमेरा के निधन के बाद क्रिएटिव हाउस ने अपनी चमक और धमक खो दी है। इससे पहले रमेश अग्रवाल ने विधायक बनने के बाद क्रिएटिव हाउस में सक्रियता छोड़ दी थी। ठीक यही स्थिति व्हाइट हाउस के साथ है। कभी व्हाइट हाउस डॉ वीरेंद्र गंगवाल के नाम से चलता था, लेकिन इस बार वे भी हाउस के प्रत्याशियों के साथ ज्यादा नहीं दिखे। व्हाइट हाउस की तरफ से अध्यक्ष और सचिव जैसे बड़े पदों का चुनाव लड़ चुके व्हाइट हाउस के एक और दिग्गज भूपेन्द्र जैन पहले से ही अलग संगठन चला रहे हैं।

 

सावन मेला बना घाटे का सौदा

 

जंगल में मोर नाचा किसने देखा, यह कहावत इन दिनों ग्वालियर व्यापार मेला परिसर में लगे सावन मेला पर खूब लागू हो रही है। अधिकांश शहरवासियों को पता ही नहीं है कि उनके शहर में सावन मेला लगने जा रहा है, वजह यह कि मेला प्राधिकरण ने सावन मेला का नामचारे तक के लिए प्रचार प्रसार नहीं किया। सैलानियों के बेहद कम संख्या में आने की आशंका के चलते यहां महंगे किराए पर दुकानें लेने वाले व्यापारियों के लिए सावन मेला घाटे का सौदा बन गया है। व्यापारी असमंजस में हैं, सावन मेला शिड्यूल के हिसाब से 20 जुलाई को शुरू हो जाना था लेकिन अब तक हीलहवाला नहीं है।

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