आईआईटी इंदौर के वैज्ञानिकों ने विकसित की नई तकनीक

इंदौर: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) इंदौर के वैज्ञानिकों ने पर्यावरण संरक्षण और सतत औद्योगिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है. संस्थान के शोधकर्ताओं ने कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) और बायोडीज़ल उत्पादन के उप-उत्पाद ग्लिसरॉल जैसे दो सामान्य अपशिष्ट पदार्थों को मात्र सात मिनट में मूल्यवान हरित रसायनों में परिवर्तित करने की ऊर्जा-कुशल तकनीक विकसित की है.

कम तापमान पर कार्य करने वाली यह नई प्रक्रिया समय, ऊर्जा और लागत तीनों की बचत करती है तथा औद्योगिक अपशिष्ट के प्रभावी उपयोग के साथ हरित भविष्य की दिशा में एक नई राह खोलती है.यह शोध आईआईटी इंदौर के रसायन विज्ञान विभाग के डॉ. अमरेंद्र के. सिंह के नेतृत्व में शोधकर्ताओं अचेना साहा, शंभु नाथ और एकता यादव द्वारा किया गया है. शोध के निष्कर्ष यूनाइटेड किंगडम की रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री की प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका ग्रीन केमिस्ट्री में प्रकाशित हुए हैं, जिसे हरित रसायन विज्ञान के क्षेत्र की प्रमुख वैज्ञानिक पत्रिकाओं में शामिल किया जाता है.

दो बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों का एक साथ समाधान
वर्तमान समय में बढ़ता कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण बन रहा है, जबकि बायोडीज़ल उद्योग से बड़ी मात्रा में निकलने वाला ग्लिसरॉल उप-उत्पाद भी अधिकांशतः अनुपयोगी रह जाता है। आईआईटी इंदौर के वैज्ञानिकों ने इन दोनों अपशिष्ट पदार्थों को समस्या के बजाय संसाधन के रूप में देखते हुए इन्हें एक साथ उपयोग कर मूल्यवान रसायनों में बदलने की अभिनव तकनीक विकसित की है.

सात मिनट में पूरी हुई पूरी प्रक्रिया
शोधकर्ताओं ने ट्रांसफर हाइड्रोजनेशन प्रक्रिया के तहत विशेष रूप से विकसित रुथेनियम-आधारित उत्प्रेरक का उपयोग किया. इसके माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड से प्राप्त स्थिर अकार्बनिक कार्बोनेट यौगिकों की ग्लिसरॉल के साथ अभिक्रिया कराई गई. माइक्रोवेव ऊष्मन तकनीक के उपयोग से रासायनिक अभिक्रिया की गति कई गुना बढ़ गई और पूरी प्रक्रिया केवल 50 डिग्री सेल्सियस तापमान पर मात्र सात मिनट में पूरी हो गई. सामान्यतः इस प्रकार की प्रक्रियाओं के लिए उच्च तापमान, अधिक दाब और कई घंटों का समय आवश्यक होता है, लेकिन आईआईटी इंदौर की नई तकनीक ने कम ऊर्जा में तेज गति से परिणाम प्राप्त कर इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज की है.

दो महत्वपूर्ण हरित रसायनों का हुआ उत्पादन
इस तकनीक के माध्यम से लैक्टिक अम्ल और फॉर्मिक अम्ल जैसे दो महत्वपूर्ण हरित रसायनों का उत्पादन किया गया. लैक्टिक अम्ल जैव-अवक्रमणीय (बायोडिग्रेडेबल) प्लास्टिक के निर्माण का प्रमुख कच्चा माल है, जो एकल-उपयोग प्लास्टिक का पर्यावरण-अनुकूल विकल्प माना जाता है। इसके अलावा इसका उपयोग सौंदर्य प्रसाधन और औषधि उद्योग में भी व्यापक रूप से किया जाता है. वहीं, फॉर्मिक अम्ल हाइड्रोजन के सुरक्षित भंडारण और स्वच्छ ऊर्जा आधारित फ्यूल सेल तकनीक में उपयोगी है. इससे हरित परिवहन और स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों को बढ़ावा मिलने की संभावना है.

अनुसंधान संस्कृति का उत्कृष्ट उदाहरणः प्रो. सुहास एस. जोशी
आईआईटी इंदौर के निदेशक प्रो. सुहास एस. जोशी ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह शोध संस्थान की नवाचार आधारित अनुसंधान संस्कृति का उत्कृष्ट उदाहरण है. उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों ने औद्योगिक अपशिष्ट और कार्बन डाइऑक्साइड को मूल्यवान हरित रसायनों में परिवर्तित कर यह साबित किया है कि वैज्ञानिक नवाचार स्वच्छ एवं उत्तरदायी विनिर्माण को नई दिशा दे सकता है. उन्होंने इस उपलब्धि के लिए पूरी शोध टीम को बधाई दी.

परिपत्र अर्थव्यवस्था को मिलेगा बढ़ावा
शोध के प्रमुख अन्वेषक डॉ. अमरेंद्र के. सिंह ने कहा कि यह तकनीक कम ऊर्जा पर आधारित सतत परिपत्र अर्थव्यवस्था (सर्कुलर इकोनॉमी) की दिशा में एक व्यवहारिक मॉडल प्रस्तुत करती है. इससे पर्यावरणीय अपशिष्टों को सीधे जैव-अवक्रमणीय प्लास्टिक तथा स्वच्छ ऊर्जा के लिए आवश्यक आधारभूत रसायनों में परिवर्तित किया जा सकेगा. उनका कहना है कि यह तकनीक भविष्य में औद्योगिक क्षेत्र के लिए अपशिष्ट प्रबंधन का प्रभावी समाधान साबित हो सकती है.

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