इंदौर: इंदौर में नगर निगम एल्डरमैन, आईडीए,पार्टी में कई मोर्चा अध्यक्ष, प्रदेश स्तर पर राजनीतिक पद हो, सभी नियुक्तियों को प्रदेश भाजपा ने रोक लिया है क्यों? इसका कारण क्या हो सकता है? ऐसी कई अटकलें राजनीतिक हलकों से लेकर सामान्य जनता के बीच चर्चा चल रही है.शहर में नगर निगम परिषद का कार्यकाल ख़त्म होने में सिर्फ 9 महीने बचे हैं. सत्ताधारी दल भाजपा इंदौर के एल्डरमैन नियुक्ति का फैसला नहीं कर पा रही है.
सिर्फ नगर निगम ही नहीं, बल्कि आईडीए अध्यक्ष, संगठन के विभिन्न मोर्चे के अध्यक्ष, निगम मंडल के साथ प्रदेश स्तर पर संगठन में जिम्मेदारी देने के लिए इंदौर के नेताओं की बुरी तरह से अनदेखी हो रही है. इंदौरी नेताओं को सरकार में भागीदारी से लगातार दूर रखा जा रहा है. इसका क्या कारण हो सकता है? यही सवाल चर्चा शहर में चर्चा का विषय बना हुआ है. आखिर इंदौर को लेकर सत्ता और संगठन क्यों दूरी बनाए हुए है. देखा जा सकता है कि कांग्रेस के समान भाजपा में भी कई गुट और क्षत्रप बन गए हैं. भाजपा में सिंधिया विजयवर्गीय, मेंदोला, महापौर, लालवानी, ताई, हार्डिया, गौड़ और वर्मा के समर्थकों के बीच नाम तय करना टेढ़ी खीर हो गया है.
सामंजस्य बैठाना मुश्किल
ऐसा माना जा रहा है कि सत्ता एवं संगठन के खिलाफ विरोध होने की संभावना के कारण भी इंदौर को प्रतिनिधित्व देने में प्रदेश भाजपा आनाकानी कर रही है. वहीं पार्टी में विद्रोह की संभावना इसलिए बलवती दिखाई दे रही है कि पद संख्या में कम है, लेकिन दावेदार इतने है कि सामंजस्य बैठाना मुश्किल है. उससे बढ़ कर शहर के विभिन्न नेताओं के बीच भी सहमति बनाना और ज्यादा मुश्किल हो गया है.
ज्यादा भागीदारी चाहते हैं नेता
कहा जा रहा है कि बीजेपी के अधिकांश नेता वर्तमान सत्ता में ज्यादा से ज्यादा भागीदारी चाहते है और संगठन में पूर्व विधायक एवं वरिष्ठ नेताओं को भी पद देने का आंतरिक विरोध कर रहे है. तमाम नेताओं में एक ही बात है कि कुछ भी हो उनके समर्थकों को ज्यादा पद और सत्ता की भागीदारी हो. इस सबके बीच इंदौर में विजयवर्गीय, मुख्यमंत्री से समझौतावादी रणनीति पर बात करना उचित नहीं समझ रहे है. परिणाम स्वरूप किसी भी पद पर सहमति नहीं बन पा रही है. इसका मजा आम जनता और राजनीतिक हलकों में तमाम तरीकों की चर्चा के साथ लिया जा रहा है
