ग्वालियर चंबल डायरी
हरीश दुबे
दतिया में चुनावी बिसात पर मुकाबला काँटे का फंस गया है। सत्तारूढ़ दल के लिए तो यह प्रतिष्ठा की लड़ाई बन ही गई है। कांग्रेस भी पंद्रह साल के लंबे अंतराल के बाद पिछले चुनाव में कब्जे में आई इस सीट को किसी भी सूरत में खोना नहीं चाहती है, यही वजह है कि दोनों दलों ने दतिया कब्जाने के लिए पूरी ताकत लगा दी है। मुकाबला भले ही आमने सामने का है लेकिन आजाद समाज पार्टी के दामोदर यादव इस चुनाव को त्रिकोणीय मुकाबले में बदलने की हरसंभव कोशिश कर रहे रहे हैं। चुनाव मैदान में एक चौथी पार्टी भगवा दल भी है जिसने किन्नर समाज की संजना सिंह को चुनाव समर में उतारा है। नरोत्तम मिश्रा जैसे नामचीन नेता का टिकट कटने की पृष्ठभूमि एवं किन्नर प्रत्याशी द्वारा भाजपा व कांग्रेस के खिलाफ ताल ठोकने से दतिया उपचुनाव राष्ट्रीय स्तर पर खूब सुर्खियां बटोर रहा है। भाजपा और कांग्रेस ने इस उपचुनाव को किस कदर गंभीरता से लिया है, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि दोनों मुख्य प्रतिद्वंद्वी दलों के सूबाई सदर पीतांबरा नगरी में डेरा डाले हुए हैं। भाजपा के प्रदेश प्रभारी महेन्द्र सिंह खुद चुनाव कार्यालय में मौजूद रहकर मॉनिटरिंग कर रहे हैं लेकिन कांग्रेस में अभी भी प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी का इंतजार चल रहा है। यह कहने में हर्ज नहीं है कि चंबल के बीहड़ों की सरहद पर स्थित बुंदेलखंड की इस सीट पर चुनाव अभियान इस तरह उलझा हुआ है कि राजनीति के धुरंधर पंडित भी कोई आंकलन करने या पूर्वानुमान लगाने में हिचक रहे हैं। नरोत्तम मिश्रा सक्रियता के साथ चुनाव अभियान में जुटे नजर आ रहे हैं लेकिन दोनों ही मुख्य दलों के चुनाव प्रबंधकों को भितरघात का खतरा नजर आ रहा है। कांग्रेस ने बड़ी मशक्कत कर अवधेश नायक को तो भाजपा में जाने से रोक लिया है और वे कांग्रेस के समर्थन में सभाएं एवं बैठकें लेने लगे हैं लेकिन निवर्तमान विधायक राजेन्द्र भारती अभी भी कांग्रेस के समर्थन में पूरी तरह सक्रिय नहीं हुए हैं, इसकी एक वजह उनकी अस्वस्थता भी बताई जा रही है, कांग्रेस राजेंद्र भारती की धर्मपत्नी या बेटे को टिकट देने के लिए तैयार थी लेकिन राजेंद्र भारती ने खुद ही बयान जारी कर अपने परिवार के किसी सदस्य के चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया था। यह कह सकते हैं कि पीतांबरा नगरी से आने वाला जनादेश 2028 के चुनाव समर की दशा और दिशा निर्धारित करेगा।
चेंबर चुनाव के नतीजों ने दरका दीं हाउसों की दीवारें
26 के चेंबर चुनाव के नतीजे ने इस सवासौ साल पुरानी मध्यभारत की सबसे बड़ी व्यापारिक संस्था के इतिहास में नया ही इतिहास लिख दिया है। करीब चार दशक तक चेंबर के मुखिया रहे स्व. बाबू दुर्गाप्रसाद मंडेलिया द्वारा खुद ही पद छोड़ने के बाद से चेंबर पूरी तरह दो हाउसों में बंट गया था। हाउस ही अपने पैनल चुनाव मैदान में उतारते थे और स्वतंत्र प्रत्याशियों का रिवाज ही नहीं था। इस बार के चेंबर चुनाव में ग्लैमर और साधन सम्पन्नता से दूर जमीनी स्तर पर सक्रिय रहने वाले डॉ. प्रवीण अग्रवाल ने व्हाइट हाउस को कड़ी चुनौती देते हुए उसके कद्दावर प्रत्याशी पारस जैन को छहसौ से ज्यादा वोटों के बड़े अंतर से शिकस्त देकर चेंबर का परिदृश्य ही बदल दिया। यह भी पहली मर्तबा हुआ जब किसी अध्यक्ष को दोबारा से चुना गया।
जाहिर है कि प्रवीण को व्हाइट और क्रिएटिव, दोनों हाउसों के सदस्यों का समर्थन मिला है। इस चुनाव में नतीजों के उलटफेर के चलते व्हाइट हाउस के साथ ही क्रिएटिव हाउस को भी नुकसान झेलना पड़ा है। व्हाइट हाउस के हाथ से जहां अध्यक्ष की कुर्सी खिसक गई वहीं क्रिएटिव के खाते में बमुश्किल दो ही सीटें आईं। क्रिएटिव द्वारा अध्यक्ष पद पर उम्मीदवार न उतारने की रणनीति से इस हाउस को कोई फायदा नहीं हुआ। अंदरखाने खबर है कि क्रिएटिव ने अध्यक्ष पद पर प्रत्याशी खड़ा न करने के एवज में व्हाइट हाउस से कुछ पदों के लिए गुप्त सौदेबाजी की थी, इसी के चलते संयुक्त अध्यक्ष और उपाध्यक्ष जैसे दो पद क्रिएटीव को मिले, इसे क्रिएटिव हाउस के बाकी तीन पराजित प्रत्याशी अपने साथ षडयंत्र मान रहे हैं। हरेक चुनाव के बाद आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला चलता है लेकिन इतना तय है कि चेंबर में हाउसों की सरहदें दरक गईं और भविष्य में भी प्रवीण अग्रवाल की ही तरह आजाद उम्मीदवार अपना जौहर दिखाएंगे।
फिर गुटबाजी की भेंट चढ़ी एल्डरमैनों की लिस्ट
सत्तारूढ़ दल में स्थानीय स्तर पर व्याप्त खेमेबाजी और गुटीय असंतुलन की स्थिति अब ग्वालियर का ही नुकसान करने लगी है। छत्रपों की गुटीय राजनीति के चलते पहले मेला, साडा और जीडीए के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पदों पर नियुक्तियां बरसों तक अटकी रहीं और मौजूदा सरकार का आधा कार्यकाल गुजर जाने के बाद ग्वालियर के ये तीन प्राधिकरण किसी तरह भरे जा सके। अब यही कहानी फिर दोहराई जा रही है। प्रदेश सरकार ने स्थानीय निकायों में राजनीतिक नियुक्तियों का सिलसिला शुरू करते हुए बाकी 13 नगर निगमों में तो एल्डरमैन नियुक्त कर दिए लेकिन इस सूची में ग्वालियर नगर निगम को वेटिंग में रखा गया है जबकि मौजूदा ग्वालियर निगम परिषद का कार्यकाल खत्म होने में एक साल से भी कम समय बचा है, तो क्या ग्वालियर निगम में चंद महीनों के लिए एल्डरमैन बनाए जाएंगे, या फिर नियुक्त होंगे ही नहीं।
ग्वालियर में भाजपा स्पष्ट तौर पर सिंधिया और नरेंद्र सिंह के खेमों में बटी है, दोनों खेमों को एक दूसरे के द्वारा अनुशंसित नाम किसी भी सूरत में नहीं सुहाते हैं, यही वजह है कि ग्वालियर निगम के एल्डरमैनों की लिस्ट कई बार बनाई और डस्टबिन में डाली जा चुकी है। ग्वालियर में सत्तादल के दो बड़े नेताओं और विभिन्न गुटों के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए चुनौती बना है। यही कारण है कि यहां एल्डरमैन की नियुक्ति एक बार फिर से टाल दी गई है। कहा तो यही जा रहा है कि दतिया उपचुनाव के चलते सरकार इन नियुक्तियों में जल्दबाजी से बच रही है लेकिन कार्यकाल खत्म होने से पहले साल भर के लिए ही सही, पार्षदी का सुख भोगने की ख्वाहिश रखने वाले भाजप कार्यकर्ताओं को तो फिलहाल झटका ही लगा है। उन्हें अब इंतजार इस बात का है कि ग्वालियर निगम में एल्डरमैन की नियुक्तियां कब होंगी और सरकार किस नए समावेशी फार्मूले के तहत इन नामों पर अंतिम मोहर लगाएगी।
