नयी दिल्ली, 13 जुलाई (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने बकरीद या किसी अन्य दिन तमिलनाडु में कहीं भी गायों और बछड़ों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश पर आज रोक लगा दी। उच्चतम न्यायालय की न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने उच्च न्यायालय के निर्देश को चुनौती देने वाली तमिलनाडु सरकार की विशेष अनुमति याचिका पर नोटिस जारी करते हुए यह अंतरिम आदेश पारित किया है। पीठ ने टिप्पणी की कि राज्य भर में गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने वाले उच्च न्यायालय के निर्देश में प्रथम दृष्टया ‘सुधार’ की आवश्यकता है।
तमिलनाडु सरकार ने तर्क दिया कि यह आदेश तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958 एवं अन्य लागू कानूनों के विपरीत है, जो पशु वध को विनियमित करते हैं, लेकिन पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाते हैं।
मद्रास उच्च न्यायालय ने 27 मई को बकरीद के दौरान वध के विनियमन की मांग वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पूरे तमिलनाडु में गायों और बछड़ों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए राज्य ने तर्क दिया कि यह तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958 का उल्लंघन करता है, जो कानून के अनुसार गायों की कुछ श्रेणियों के वध की अनुमति देता है।
राज्य ने तर्क दिया कि उच्च न्यायालय ने एक ऐसे सरकारी आदेश पर भरोसा कर जनहित याचिका के दायरे का उल्लंघन किया, जो याचिका में चुनौती के अधीन नहीं था और गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया, जबकि याचिका में केवल सार्वजनिक स्थानों पर वध के विनियमन की मांग की गयी थी। राज्य ने यह भी तर्क दिया कि यह निर्णय आंतरिक रूप से विरोधाभासी है और वैधानिक ढांचे के विपरीत है।
राज्य ने उच्च न्यायालय के इस निष्कर्ष पर भी आपत्ति जतायी कि अधिकारियों ने स्वीकार किया था कि सार्वजनिक स्थानों पर गोहत्या होगी। राज्य ने यह भी तर्क दिया कि उसने लगातार यह रुख बनाये रखा है कि इस प्रकार के वध को रोका जायेगा और इसे केवल निर्धारित तथा ऐसे स्थानों तक सीमित रखा जायेगा, जो खुला स्थान न हो।

