दमोह:मप्र दमोह जिले के बटियागढ़ विकासखंड के छोटे से गांव कठोरा में रहने वाले गजेंद्र पटेल और उनकी पत्नी सीता पटेल एक साधारण किसान परिवार से हैं। सीमित आय, खेती पर निर्भर जीवन और अनेक आर्थिक कठिनाइयों के बीच उनका जीवन सामान्य रूप से चल रहा था। लेकिन उनकी जिंदगी में एक बड़ा संघर्ष तब शुरू हुआ जब उनकी बेटी प्रियंशी पटेल का जन्म हुआ।प्रियंशी अभी मात्र एक वर्ष की थी, लेकिन वह जन्म से ही क्लेफ्ट लिप (कटे होंठ) जैसी जन्मजात समस्या से जूझ रही थी। उसके चेहरे की इस स्थिति को देखकर माता-पिता बेहद चिंतित और दुखी थे। गाँव में लोग तरह-तरह की बातें करते, कुछ सहानुभूति जताते तो कुछ अनजाने में ताने भी मारते थे।
लेकिन गजेंद्र और सीता के लिए उनकी बेटी सबसे अनमोल थी और उन्होंने ठान लिया कि वे हर हाल में उसका इलाज करवाएंगे।आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण इलाज कराना उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती थी। कई बार उन्होंने नजदीकी अस्पतालों के चक्कर लगाए, लेकिन सही जानकारी और मार्गदर्शन नहीं मिल पाया। इसी दौरान किसी परिचित ने उन्हें राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीकेएस) के बारे में बताया, जिसके तहत बच्चों की जन्मजात बीमारियों का निःशुल्क उपचार कराया जाता है।गजेंद्र पटेल ने तुरंत स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं से संपर्क किया।
मामला जिला स्तर तक पहुँचा और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO), दमोह के संज्ञान में लाया गया। CMHO दमोह एवं संबंधित नोडल अधिकारी ने इस प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए।केस तैयार करने की प्रक्रिया आसान नहीं थी, लेकिन DEIC (District Early Intervention Centre) की टीम ने पूरी लगन एवं जिम्मेदारी के साथ सभी आवश्यक औपचारिकताएँ पूरी कीं। इसके बाद प्रियंशी का प्रकरण DEIC, दमोह में पंजीकृत किया गया। DEIC टीम ने पूरी संवेदनशीलता एवं तत्परता के साथ सभी दस्तावेज, मेडिकल रिकॉर्ड तथा आवश्यक जानकारी तैयार की। इसके बाद प्रियंशी को बेहतर उपचार हेतु दुबे सर्जिकल हॉस्पिटल, जबलपुर रेफर किया गया।
गजेंद्र और सीता के लिए यह पहली बार था जब उन्हें अपने गाँव से दूर किसी बड़े शहर में इलाज के लिए जाना पड़ा। उनके मन में डर भी था और उम्मीद भी। लेकिन DEIC टीम एवं स्वास्थ्य विभाग के सहयोग ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया। जबलपुर के दुबे सर्जिकल हॉस्पिटल में विशेषज्ञ चिकित्सकों ने प्रियंशी की जांच की और ऑपरेशन की योजना बनाई।ऑपरेशन का दिन पूरे परिवार के लिए अत्यंत तनावपूर्ण था। कई घंटों के इंतजार के बाद जब डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर से बाहर आए तो उन्होंने बताया कि ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा है। यह सुनते ही गजेंद्र और सीता की आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े।
ऑपरेशन के बाद प्रियंशी को कुछ समय तक विशेष देखभाल की आवश्यकता रही। चिकित्सकों एवं अस्पताल के स्टाफ ने पूरी जिम्मेदारी के साथ उसकी देखभाल की। धीरे-धीरे उसकी स्थिति में सुधार होने लगा। कुछ ही सप्ताहों में उसकी मुस्कान, जो पहले अधूरी थी, अब पूरी तरह खिल उठी।आज प्रियंशी एक स्वस्थ एवं खुशहाल जीवन की ओर बढ़ रही है। उसकी मुस्कान केवल उसके परिवार की खुशी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK), DEIC दमोह, स्वास्थ्य विभाग एवं समर्पित चिकित्सकों की संवेदनशील सेवा का जीवंत प्रमाण है।
