जनाजे में कुरान की आयतों से ईरान की साइलेंट डिप्लोमेसी, भारत को दिया ये खास संदेश

अयातुल्ला अली खामेनेई के जनाजे में ईरान ने कुरान की आयतों के जरिए साइलेंट डिप्लोमेसी का इस्तेमाल किया। 30 से ज्यादा देशों को उनके रिश्तों के आधार पर खास संदेश दिए गए हैं।

ईरान ने दुनिया को अपनी साइलेंट डिप्लोमेसी का एक बहुत बड़ा और अनोखा उदाहरण दिखाया है। 4 जुलाई 2026 को तेहरान में अयातुल्ला अली खामेनेई के जनाजे में 30 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधिमंडल शामिल हुए। इस दौरान विदेशी मेहमानों के सामने कुरान की अलग-अलग आयतें पढ़ी गईं, जो एक सोची-समझी कूटनीति थी। हर देश के साथ ईरान के राजनीतिक और धार्मिक रिश्तों के आधार पर ही इन आयतों का विशेष चयन किया गया था।

अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का साफ मानना है कि इन आयतों का यह चुनाव सिर्फ धार्मिक नहीं था, बल्कि कूटनीतिक था। जब विभिन्न देशों के प्रतिनिधि ताबूत के पास से गुजर रहे थे, तो उनके हिसाब से कुरान की आयतें बदल रही थीं। ईरान सरकार ने भले ही इस पूरी घटना पर कोई भी आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन संदेश बिल्कुल स्पष्ट था। इसके जरिए ईरान ने दुनिया भर को अपनी विदेश नीति और मजबूत इरादों का बहुत ही कड़ा संदेश दिया है।

सऊदी अरब को बद्र की जंग का संदेश
जनाजे में सबसे ज्यादा हैरान करने वाला वाकया तब हुआ जब सऊदी अरब का प्रतिनिधिमंडल ताबूत के सामने पहुंचा। उस समय सूरह अल इमरान की आयत पढ़ी गई जो इस्लाम की पहली बड़ी लड़ाई बद्र की जंग की याद दिलाती है। 624 ईस्वी में लड़ी गई इस जंग में एक बहुत ही छोटी मुस्लिम सेना ने अपने से बड़ी दुश्मन सेना को हराया था। इसके जरिए ईरान ने दिखाया कि वह अमेरिका और इजरायल के युद्ध में डटा रहा, जबकि सऊदी अरब पीछे हट गया।

हमास और हिज्बुल्लाह को मिला हौसला
ईरान के वैचारिक और सैन्य सहयोगियों, जिन्हें एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस कहा जाता है, उन्हें भी खास आयतें सुनाई गईं। हमास के प्रतिनिधियों का स्वागत उन पुरुषों वाली आयत से हुआ जिन्होंने अल्लाह के साथ अपना किया वादा निभाया। हिज्बुल्लाह के लिए वह आयत पढ़ी गई जिसमें कहा गया है कि कमजोर न पड़ें और शोक न मनाएं क्योंकि जीत तुम्हारी होगी। इसी तरह यमन के हुथियों को भी मजबूती से डटे रहने और बिना डरे लड़ने वाली आयतें विशेष रूप से डेडिकेट की गईं।

भारत और रूस के लिए नरम कूटनीति
रूस, चीन और भारत जैसे मित्र देशों के लिए युद्ध की नहीं, बल्कि सांत्वना और नरम लहजे वाली आयतें चुनी गईं। चीन के लिए पढ़ी गई खास आयत में यह साफ कहा गया कि असली जीत सिर्फ और सिर्फ अल्लाह से मिलती है। रूस के प्रतिनिधिमंडल को सुनाया गया कि आखिर में हमेशा नेक और सच्चे लोगों के हक में ही फैसला होता है। भारत के लिए भी कमजोर न पड़ें और शोक न मनाएं वाले हिस्से का एक बहुत ही छोटा और सौम्य अंश पढ़ा गया।

विश्लेषकों ने किया कूटनीति का डिकोड
अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषक शाहीन मोदारेस ने इस पूरी घटना को आयतों के जरिए शीतयुद्ध कालीन क्रेमलिनोलॉजी करार दिया है। उन्होंने बताया कि हर एक विदेशी प्रतिनिधिमंडल को एक आयत सौंपी गई थी जो एक टारगेटेड राजनीतिक संदेश थी। ईरान ने सऊदी अरब को डांटा, तुर्किये को शर्मिंदा किया और अपने सभी प्रॉक्सी ग्रुप्स को सांत्वना देकर कतर का शुक्रिया अदा किया। ईरानियों ने इस पूरी कूटनीति को किसी भी विदेशी विश्लेषक से बहुत ज्यादा तेजी से और आसानी से डिकोड कर लिया।

पहले भी हुआ आयतों का इस्तेमाल
सोमवार को ईरान ने राजकीय अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए भारत का बहुत ही विशेष आभार जताया। ईरान का किसी भी भारी तनाव के समय कुरान की आयतों का इस्तेमाल करना कोई बिल्कुल नया मामला नहीं है। इससे पहले अप्रैल में भी विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी धमकियों का जवाब सूरह अल-मुजादिला की आयतों से दिया था। मोजतबा खामेनेई ने भी शोक के 40वें दिन अपने संदेश की शुरुआत सूरह अल-फत्ह की आयत से बहुत ही कड़े अंदाज में की थी।

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