यूक्रेन के ड्रोन हमलों से रूस में पैदा हुआ भीषण तेल संकट, अब दूसरे देशों से पेट्रोल खरीदने को मजबूर। जानिए भारत और बेलारूस से कैसे हो रही सप्लाई।
रूस और यूक्रेन पिछले पांच साल से एक-दूसरे से जंग लड़ रहे हैं। इसी बीच इस युद्ध से जुड़ी एक रिपोर्ट सामने आई है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि रूस बड़ी संंख्या में तेल खरीद रहा है। ऐसे में लोग ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि दुनिया के सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश आज खुद तेल आयात क्यों कर रहा है?
रिपोर्ट के मुताबिक, रूस इस समय तेल की कमी से जूझ रहा है। हालात इतने खराब हो गए हैं कि कई इलाकों में लोगों को सीमित मात्रा में ही ईंधन मिल रहा है। ऐसे में सवाल आता है कि जो रूस कल तक पूरी दुनिया को तेल बेचता था उसके साथ ऐसा क्या हो गया कि वो आज तेल खरीदने को मजबूर हो गया है? इसमें अमेरिका-ईरान युद्ध की क्या भूमिका है?
यूक्रेन ने तबाह की रिफाइनरी
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि रूस में उत्पन्न हुई ईंधन संकट के पीछे सबसे बड़ा हाथ यूक्रेन की ओर से लगातार हो रहे ड्रोन हमलों का है। जानकारी के मुताबिक, यूक्रेन मार्च 2026 से अब तक लगातार ड्रोन हमलों के जरिए रूस की तेल रिफाइनरियों और तेल भंडारण केंद्रों को निशाना बना रही है। यूक्रेन हमलों में रूस की आधी से ज्यादा रिफाइनरियां या तो बंद हो गई हैं या फिर उनके उत्पादन क्षमता में गिरावट आई है। इससे रूस को आर्थिक रूप से भारी नुकसान हुआ है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूस की 10 सबसे बड़ी रिफाइनरियों में से 8 पर हमले हो चुके हैं। हाल ही में 4 जुलाई को यूक्रेन ने रूस के सेंट पीटर्सबर्ग स्थित एक बड़ी रिफाइनरी पर ड्रोन हमला किया। यह रिफाइनरी हर साल करीब 1.25 करोड़ टन पेट्रोलियम उत्पाद तैयार करती है। लगातार हमलों की वजह से रूस की कुल तेल रिफाइनिंग क्षमता में लगभग 42.7 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है।
अमेरिका-ईरान युद्ध की क्या भूमिका
रिपोर्ट में बताया गया है कि रूस की इस स्थिति में अमेरिका-ईरान युद्ध की भी भूमिका है। दरअसल अमेरिका और इजरायल के खिलाफ युद्ध के दौरान ईरान ने सिर्फ इनके सैन्य ठिकानों पर हमले किए, बल्कि मिडिल ईस्ट के देशों में मौजूद तेल रिफाइनरियों पर भी हमले किए। इसके परिणाम स्वरूप पूरी दुनिया में तेल संकट पैदा हो गया। इसके अलावा मिडिल ईस्ट के देशों की आय का बड़ा हिस्सा तेल बेचने से ही आता है, जो अमेरिका के सहयोगी भी हैं। ऐसे में इन देशों ने न केवल अमेरिका पर युद्ध रोकने का दबाव बनाया। साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान के साथ समजौता करने पर लगभग मजबूर कर दिया।
यूक्रेन भी ईरान की इसी रणनीति को अब रूस के खिलाफ अपना रहा है। क्योंकि यूक्रेन को पता है कि आमने-सामने की लड़ाई में रूस को हरा पाना नामुमकिन है। साथ ही रूस को तब तक समझौता करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता जब तक वो आर्थिक रूप से मजबूत है। ऐसे में यूक्रेन ईरान की तरह रूस के तेल रिफाइनरियों पर हमला कर रहा है। ताकि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को समझौता करने के लिए मजबूर किया जा सके।
रूस ड्रोन हमलों को रोक क्यों नहीं पा रहा?
कई लोगों के मन में सवाल है कि रूस जैसी सैन्य महाशक्ति यूक्रेन के ड्रोन हमलों को रोकने में सफल क्यों नहीं हो रही है। इसके पीछे कई कारण हैं।
यूक्रेन के सस्ते और आधुनिक ड्रोन: यूक्रेन के कई ड्रोन अपेक्षाकृत कम लागत वाले हैं और जमीन से बहुत कम ऊंचाई पर उड़ते हैं। इसी वजह से रूस की महंगी एयर डिफेंस प्रणाली, जैसे S-400, उन्हें समय पर पहचान नहीं पाती।
रूस का विशाल भूभाग है: दुनिया का सबसे बड़ा देश होने के कारण उसकी हर रिफाइनरी, तेल डिपो और ऊर्जा केंद्र की सुरक्षा करना आसान नहीं है। हर जगह एयर डिफेंस सिस्टम तैनात करना संभव नहीं हो पाता।
पश्चिमी देशों के प्रतिबंध: इन प्रतिबंधों की वजह से रूस को कई जरूरी विदेशी मशीनें और उपकरण नहीं मिल पा रहे हैं, जिनकी जरूरत रिफाइनरियों की मरम्मत के लिए होती है। इसलिए क्षतिग्रस्त संयंत्रों को जल्दी ठीक करना मुश्किल हो रहा है।
आम लोगों पर दिखने लगा असर
रिफाइनरियों को नुकसान पहुंचने का असर अब रूस की जनता पर भी साफ दिखाई दे रहा है। देश के 83 में से 55 से ज्यादा क्षेत्रों में पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर सीमाएं लगा दी गई हैं। कई शहरों में पेट्रोल पंपों के बाहर लंबी-लंबी कतारें लग रही हैं। कुछ इलाकों में लोगों को सिर्फ 20 से 30 लीटर तक ही पेट्रोल खरीदने की अनुमति है। वहीं साइबेरिया जैसे क्षेत्रों में अधिकतम 40 लीटर पेट्रोल ही दिया जा रहा है।
ईंधन की कमी का असर केवल निजी वाहनों तक सीमित नहीं है। सार्वजनिक परिवहन महंगा हो गया है और कई जगहों पर कचरा उठाने जैसी जरूरी सेवाएं भी प्रभावित हुई हैं। इससे आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी मुश्किल होती जा रही है।
रूस को कितना आर्थिक नुकसान हुआ?
ड्रोन हमलों और उत्पादन में कमी की वजह से रूस को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। अगस्त 2025 से अब तक रूस को करीब 13.5 अरब डॉलर का नुकसान होने का अनुमान है। इसके साथ ही देश का कुल तेल उत्पादन पिछले साल की तुलना में लगभग 25 प्रतिशत कम हो गया है। रूस की अर्थव्यवस्था काफी हद तक तेल और गैस निर्यात पर निर्भर करती है। इसलिए उत्पादन में आई यह गिरावट सरकारी आय और ऊर्जा कारोबार दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन गई है।
दूसरे देशों से तेल खरीदने की तैयारी में रूस
रूस में ईधन संकट इतना बढ़ गया है कि क्रेमलिन ने अब दूसरे देशों से पेट्रोल मंगाने की तैयारी कर ली है। यह स्थिति पिछले कई दशकों में पहली बार देखने को मिल रही है। रूस अपने पड़ोसी देश बेलारूस से हर महीने करीब 1.5 लाख मीट्रिक टन पेट्रोल खरीद रहा है। इसके अलावा कजाकिस्तान के साथ भी ईंधन आपूर्ति को लेकर समझौता किया गया है।
भारत का नाम भी इस मामले में सामने आया है। खबरों के अनुसार, भारतीय कंपनी नायरा एनर्जी ने 1 जुलाई को रूस के लिए 60,000 मीट्रिक टन पेट्रोल लेकर दो टैंकर भेजे। हालांकि भारत सरकार का कहना है कि भारत सीधे रूस को पेट्रोल नहीं बेच रहा है। यदि भारतीय ईंधन रूस पहुंच रहा है तो वह अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों के माध्यम से हो सकता है।
