सतना : जिला चिकित्सालय में सोनोग्राफी कराने के लिए लंबी वेटिंग का मामला एक बार फिर से गर्माता नजर आया जब एक मरीज को 2 महीने बाद की तारीख दे दी गई. यह समस्या पिछले कुछ वर्षों से अनवरत जारी रहने के चलते अब लोगों के मन में यह सवाल उठने लगा है कि मामला केवल व्यवस्थागत समस्या से जुड़ा हुआ है अथव इसमें किसी तरह का गड़बड़झाला भी किया जा रहा है.जिला चिकित्सालय में पिछले लगभग 3 वर्ष से सोनोग्राफी कराने के लिए लंबी वेटिंग की समस्या लगातार चली आ रही है. मामले के तूल पकडऩे पर कई तरह के आश्वासन भी सामने आ चुके हैं. लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है.
ताजा मामला उस वक्त सामने आया जब जांच कराने पहुंचे एक मरीज को 2 महीने बाद की तारीख दे दी गई. लिहाजा सवाल उठना लाजमी है कि यदि कोई मरीज किसी गंभीर बीमारी से पीडि़त है और उसे तत्काल उपचार की आवश्यकता है. तो फिर वह जिला चिकित्सालय के भरोसे नही रह सकता. क्योंकि मौजूदा व्यवस्था के अंतर्गत 2 महीने बाद उसकी सोनोग्राफी की जांच हो पाएगी. लिहाजा या तो वह निजी जांच केंद्रों में जाकर मुंह मांगा धन खर्च करे, अथवा अपनी बीमारी को और अधिक गंभीर होने का इंतजार करता रहे.
प्राप्त जानकारी के अनुसार जिला चिकित्सालय में लगभग 30-40 मरीज प्रतिदिन सोनोग्राफी कराने के लिए पहुंचते हैं. लेकिन उनमें से आधे लोगों की जांच ही हो पाती है. जबकि शेष लोगों को आगे की तारीख दे दी जाती है. गौरततलब है कि यह मामला उप मुख्यमंत्री व स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल के समक्ष भी 3 महीने पहले तब उठाया जा चुका है जब वे जिला चिकित्सालय में बैठक लेने के लिए आए थे. उस दौरान उन्होंने आश्वस्त किया था कि अतिरिक्त रेडियोलॉजिस्ट की नियुक्ति करने के साथ ही अन्य चिकित्सकों को प्रशिक्षित कर इस समस्या को जल्द सुलझा लिया जाएगा. लेकिन सोनोग्राफी के लिए भटक रहे मरीज यह बताने के लिए काफी हैं कि व्यवस्था में कितना सुधार हुआ.
उठ रहे गंभीर सवाल
जिला चिकित्सालय में सोनोग्राफी की जांच के लिए रेडियोलॉजिस्ट डॉ. हर्षिता सिंह नियमित सेवाएं देती हैं. इसके साथ हीि मेडिकल कॉलेज के कुछ रेजीडेंट्स डॉक्टर्स भी सोनोग्राफी की जांच में सहायता करने के लिए पहुंचते हैं. लेकिन इसके बावजूद भी लगातार बढ़ी रही वेटिंग को लेकर मरीजों द्वारा गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं. मरीजों का कहना है कि सोनोग्राफी जांच केंद्र में एक कर्मचारी ही सारे रजिस्टर बनाती और उनकी देखरेख करती है. इसी कड़ी में यह गंभीर आरोप भी लगाए गए कि रोगी कल्याण समिति के अंतर्गत आया के तौर पर पदस्थ इस कर्मचारी द्वारा मनमाने तरीके से मरीजों को जांच की तारीख दे दी जाती है. इस लंबी वेटिंग को जायज ठहराने के लिए कई फर्जी मरीजों की इंट्री भी दिखा दी जाती है. अब इसके पीछे कौन सा कारण प्रभावी है यह जानकारी तो अस्पताल प्रशासन की जांच के जरिए ही सामने आ सकता है.
