ग्वालियर: महानाट्य ‘युगप्रवर्तक’ ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। जीवाजी विश्वविद्यालय स्थित अटल बिहारी वाजपेयी सभागृह में नादब्रह्म नागपुर के 45 कलाकारों द्वारा प्रस्तुत इस भव्य महानाट्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन, संघर्ष, राष्ट्रचिंतन और संगठन निर्माण की यात्रा को प्रभावशाली ढंग से मंचित किया गया। लगभग दो घंटे तक चले इस नाट्य प्रदर्शन ने दर्शकों को इतिहास के उन महत्वपूर्ण प्रसंगों से परिचित कराया, जिन्होंने एक संगठन और विचारधारा की नींव रखी।
संस्कार भारती द्वारा मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह व्यवस्था प्रमुख अनिल ओक, वरिष्ठ प्रचारक श्रीधर पराडक़र, मध्य क्षेत्र के क्षेत्र कार्यकारिणी सदस्य यशवंंत इंदापुरकर, मध्य भारत प्रांत के प्रांत संघचालक अशोक पांडे, प्रांत सह कार्यवाह विजय दीक्षित, प्रांत सह संपर्क प्रमुख नवल शुक्ला, कुटुंब प्रबोधन के प्रांत संयोजक अशोक पाठक, ग्वालियर विभाग संघचालक प्रहलाद सबनानी, मंत्री नारायण सिंह कुशवाह, प्रद्युम्न सिंह तोमर, जयभान सिंह पवैया, जीवाजी विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो.राजकुमार आचार्य सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
महानाट्य की शुरुआत वर्ष 1916 के कलकत्ता से होती है, जहां युवा केशव बलिराम हेडगेवार अनुशीलन समिति के साथ क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय दिखाई देते हैं। देश की स्वतंत्रता के लिए उनके भीतर जल रही राष्ट्रभक्ति की अग्नि और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष का संकल्प प्रारंभिक दृश्यों में प्रभावी रूप से उभरकर सामने आता है। डॉक्टर बनने के बाद भी उन्होंने व्यक्तिगत जीवन की सुरक्षा और सुविधा को त्यागकर राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना।
नाटक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक दिशा पर केंद्रित रहा। इसमें कांग्रेस के भीतर चल रहे विचार-विमर्श, पूर्ण स्वराज्य की
मांग, महात्मा गांधी से डॉ. हेडगेवार की भेंट तथा विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों पर उनके दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया गया। नाट्य प्रस्तुति में यह दर्शाया गया कि डॉ. हेडगेवार का मानना था कि राष्ट्र की वास्तविक शक्ति संगठन में निहित होती है और समाज की स्थायी उन्नति के लिए अनुशासित एवं संगठित शक्ति का निर्माण आवश्यक है। इस अवसर पर डॉ. हेडगेवार द्वारा युवाओं को संबोधित करते हुए संगठन, अनुशासन और राष्ट्र समर्पण का संदेश दिया जाता है। नाटक में यह भी दिखाया गया कि किस प्रकार उन्होंने देशभर में युवाओं से संवाद स्थापित कर समाज को संगठित करने का प्रयास किया।
अभिनय की दृष्टि से सतीश खेकाले ने डॉ. हेडगेवार की भूमिका को जीवंत कर दिया। उनके संवाद, भाव-भंगिमा और मंचीय उपस्थिति ने दर्शकों को प्रभावित किया। श्री गुरुजी की भूमिका में अमोल तेलपांडे, महात्मा गांधी की भूमिका में प्रशांत मांगडे तथा लोकमान्य तिलक की भूमिका में मंगेश बावसे ने भी उत्कृष्ट अभिनय का प्रदर्शन किया। नाटक का निर्देशन सुबोध सुरजीकर ने किया, जबकि लेखन डॉ. अजय प्रधान का रहा। निर्माता पद्माकर धानोरकर के निर्देशन में तैयार इस भव्य प्रस्तुति को दर्शकों ने भरपूर सराहना दी।
