भारत-बंगलादेश के बीच रिश्तों को लेकर सोशल मीडिया पर बेवजह का हंगामा

जयंत रॉय चौधरी से
नयी दिल्ली, 19 जून (वार्ता) गत सप्ताह दो घटनाओं को लेकर भारत और बंगलादेश के बीच सोशल मीडिया पर खूब हंगामा बरपा, हालांकि इस घटनाओं का आपस में कोई सीधा संबंध नहीं था। इन घटनाओं से पता चला कि दोनों तरफ़ से अच्छी नीयत होने के बावजूद रिश्ते कितने जज़्बाती बने हुए हैं।
पहली घटना बंगलादेश में भारत के नये उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी से जुड़ी थी। सरकारी कूटनीति के आम तौर पर अपनाए जाने वाले औपचारिक तरीकों से ढाका पहुँचने के बजाय श्री त्रिवेदी और उनकी पत्नी पैदल ही पेट्रापोल-बेनापोल सीमा पार करके वहाँ पहुँचे। इसका संदेश साफ़ था कि एक राजनेता किसी पेशेवर राजनयिक की तरह प्रोटोकॉल की बजाय नज़दीकी और राजनीति के बजाय लोगों को अहमियत देने की कोशिश कर रहा था। वहाँ पहुँचने पर श्री त्रिवेदी ने भूपेन हज़ारिका के एक गाने का ज़िक्र किया, जिसमें भारतीयों और बंगलादेशी नागरिकों के “एक ही आसमान, एक ही हवा” और एक जैसे दुख साझा करने की बात कही गई थी। उन्होंने कहा कि 1.6 अरब लोगों की मिली-जुली उम्मीदें एक साझा भविष्य बना सकती हैं। यह ईमानदार बयान ऐसे दौर में दिया गया था जब जलवायु परिवर्तन ने दोनों देशों को खतरे में डाल दिया है। बंगलादेश के 2050 तक समुद्र में अपनी 17 प्रतिशत ज़मीन खोने का अनुमान है, जबकि भारत को समुद्र का जलस्तर बढ़ने और ज़्यादा समय तक चलने वाली भीषण गर्मी की लहरों (हीटवेव) का सामना करना पड़ सकता है। इसके बावजूद उनके इस बयान का तीखी आलोचनाओं के साथ स्वागत किया गया।

बंगलादेश के इस्लामी और जमात-समर्थक राजनीतिक समूहों ने इन बयानों को तुरंत “भारत की दबदबा बनाने की मंशा” का सबूत बताया। जमात-ए-इस्लामी ने इस पर सफाई मांगी और सवाल उठाया कि क्या बंगलादेश की संप्रभुता का पर्याप्त सम्मान किया जा रहा है। गौरतलब है कि जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान का समर्थन करती है और आज भी 1971 की आज़ादी की लड़ाई को गलत मानती है। यह प्रतिक्रिया श्री त्रिवेदी के शब्दों के बारे में कम और उस अविश्वास की गहराई के बारे में ज़्यादा बताती है जो आज भी दोनों देशों के रिश्तों पर छाया हुआ है, खासकर पड़ोसी देश के कट्टर दक्षिणपंथी समूह के बीच। बंगलादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त वीणा सीकरी ने यूनीवार्ता को बताया, “यह जमात नेतृत्व की एक सोची-समझी कोशिश थी कि वे पूरी तरह से नेक नीयत से दिए गए बयान को विवाद का रूप देकर दोनों देशों के बीच माहौल खराब करें।” दूसरी घटना रविवार को दिल्ली हवाई अड्डा पर हुई। बंगलादेश के प्रधानमंत्री के सलाहकार डॉ. ज़ाहिद उर रहमान हिंद महासागर पर एक सरकारी सम्मेलन में शामिल होने के लिए भारत आए थे। वे राजनयिक पासपोर्ट की बजाय निजी पासपोर्ट पर यात्रा कर रहे थे, जिस पर पुराना दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (सार्क) वीज़ा स्टिकर लगा था, जबकि सरकारी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने वाले मंत्री स्तर के प्रतिनिधि के पास राजनयिक पासपोर्ट होना चाहिए था। इसके बाद जो हुआ, वह अफ़सरशाही की गड़बड़ी जैसा लगता है। छुट्टी का दिन होने के कारण कई सरकारी दफ़्तर बंद थे और कागज़ात को लेकर हुई उलझन की वजह से उनके आने में देरी हुई। जब तक मामला साफ़ हुआ और इजाज़त मिली, तब तक श्री रहमान ने घर वापस जाने का फ़ैसला कर लिया। यह घटना जल्द ही कूटनीतिक चर्चा का विषय बन गई। फिर भी, यह साज़िश से ज़्यादा गलतियों नतीजा था, जिसे दोनों तरफ़ से बेहतर तालमेल से निश्चित रूप से टाला जा सकता था।

अलग-अलग देखा जाए तो ये घटनाएँ मामूली हैं, लेकिन एक साथ देखने पर ये एक बड़े सवाल की ओर इशारा करती हैं कि क्या भारत और बंगलादेश भरोसे की एक बड़ी छलांग लगाने के लिए तैयार हैं? इसका जवाब इसलिए अहम है क्योंकि दोनों देशों के रिश्ते एक अहम मोड़ पर हैं। बंगलादेश में बड़े राजनीतिक बदलाव हो रहे हैं। भारत अपनी क्षेत्रीय कूटनीति को नए सिरे से तय कर रहा है। पुरानी बातें और हालात, जिन्होंने पिछली सरकारों के समय रिश्तों को आकार दिया था, अब नहीं रहे। सीमा के दोनों तरफ़ नये लोग, नयी राजनीतिक ताकतें और नयी रणनीतिक सोच उभर रही है। मॉरिशस के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शांतनु मुखर्जी ने कहा, “दोनों तरफ़ परिपक्व नेतृत्व है। श्री त्रिवेदी एक अनुभवी राजनेता हैं और हर कोई जानता है कि श्री मोहम्मद यूनुस के शासनकाल के 18 महीनों में जो रिश्ते खराब हुए थे, वे अब सुधर रहे हैं।” उन्होंने कहा, “ऐसी छोटी-मोटी बातों को पीछे छोड़ देना चाहिए, ताकि हम साथ मिलकर आगे बढ़ सकें।” जानकारों का मानना है कि बांग्लादेश में कट्टरपंथियों का एक गुट अच्छे रिश्तों के इस नए दौर को खतरे में डाल रहा है। वे चाहते हैं कि बंगलादेश अपने पड़ोसी के प्रति रणनीतिक दुश्मनी के ज़्यादा जोखिम भरे रास्ते पर चले। ग्रेटर बंगलादेश की पूरी मुहिम और श्री यूनुस के दौर में भारत-विरोधी तीखी आवाज़ें उठाने में जमात ने पहल की थी। श्री सीकरी ने कहा, “ऐसी सोच को रिश्तों पर असर डालने देना दोनों देशों के लिए बुरा होगा।”

उन्होंने कहा कि श्री त्रिवेदी शायद यह बात समझते हैं और उन्होंने अपना भाषण मुख्य रूप से उन पुराने नेताओं के लिए नहीं दिया जो पुरानी शिकायतों में उलझे हुए हैं, बल्कि बंगलादेश की युवा पीढ़ी के लिए दिया। एक ऐसी पीढ़ी जो नौकरी, निवेश, शिक्षा, सम्पर्क और मौके चाहती है, जैसा कि ज़्यादातर समाजशास्त्री मानते हैं, यह पीढ़ी पिछली सदी के हर विवाद को फिर से कुरेदने में कोई दिलचस्पी नहीं रखती। असल बात यह है कि बंगलादेश और भारत के युवा एक ही डिजिटल स्पेस का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें एक जैसी आर्थिक और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चिंताएं हैं, और वे एक जैसे भविष्य की उम्मीद करते हैं। कलकत्ता अनुसंधान समूह के साथ काम करने वालीं प्रव्रजन एवं लैंगिक अध्ययन की विशेषज्ञ समता बिस्वास ने कहा, “उन्हें विचारधारा की लड़ाइयों में उतनी दिलचस्पी नहीं है, जितनी इस बात में कि क्या उनकी सरकारें खुशहाली के लिए हालात बना सकती हैं।” उन्होंने कहा कि श्री त्रिवेदी का सीमा पार करके जाना, अपने आप में एक छोटा सा ही सही, लेकिन भविष्य के बारे में अलग तरह से सोचने का आमंत्रण । भारत और बंगलादेश इस न्योते को स्वीकार करते हैं या नहीं, इससे आने वाले सालों में दक्षिण एशिया के सबसे अहम रिश्तों में से एक की दिशा तय हो सकती है।

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