
जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ ने गोरखपुर थाना पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने वाली एक महत्वपूर्ण याचिका पर राज्य शासन सहित अन्य अनावेदकों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि संज्ञेय अपराध की शिकायत मिलने के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं की गई और उसके स्थान पर प्रारंभिक जांच की प्रक्रिया शुरू कर दी गई।
याचिकाकर्ता जबलपुर निवासी अधिवक्ता वंदना श्रोती की ओर से अधिवक्ता योगेश सोनी ने पक्ष रखते हुए न्यायालय को बताया कि 19 फरवरी 2026 को गोरखपुर थाने में प्रस्तुत शिकायत में संज्ञेय अपराध के स्पष्ट तथ्य होने के बावजूद थाना प्रभारी नितिन कमल ने एफआईआर दर्ज नहीं की। याचिका के अनुसार बीएनएसएस की धारा 173(3) का सहारा लेकर प्रारंभिक जांच और अन्य कार्यवाही तो शुरू कर दी गई, लेकिन विधिसम्मत अपराध पंजीबद्ध नहीं किया गया। याचिका में यह भी कहा गया है कि शिकायत को जनरल डायरी में दर्ज कर उसका क्रमांक तक शिकायतकर्ता को उपलब्ध नहीं कराया गया। जबकि हाईकोर्ट पूर्व में अपने एक फैसले में स्पष्ट कर चुका है कि प्रत्येक शिकायत की जनरल डायरी में प्रविष्टि कर उसका नंबर शिकायतकर्ता को देना अनिवार्य है। साथ ही लंबित शिकायतों की निगरानी की जिम्मेदारी पुलिस अधीक्षक की मानी गई है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के चर्चित ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश शासन प्रकरण का भी उल्लेख किया गया, जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा था कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर एफआईआर दर्ज करना पुलिस का बाध्यकारी कर्तव्य है और ऐसा नहीं करने वाले अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की जानी चाहिए। याचिका में आरोप लगाया गया है कि संबंधित थाना प्रभारी बार-बार एफआईआर दर्ज करने से बचते रहे हैं तथा वैधानिक प्रविधानों का दुरुपयोग कर रहे हैं। याचिकाकर्ता ने उनके विरुद्ध विभागीय जांच प्रारंभ करने, शिकायत से जुड़े समस्त अभिलेख न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कराने तथा आवश्यक निर्देश जारी करने की मांग की है।
